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गंज कॉम्प्लेक्स में प्रथम दृष्टि में दिखने लगे हैं घपले, होनी चाहिये जांच

18/11/2019
इन दिनों नगर निगम के निर्माण कार्यों के घपले , भौतिक रूप से सबके सामने दिखाई देने लगे हैं. दुर्ग शहर के कांग्रेसी विधायक अरुण वोरा व दुर्ग नगर निगम के सभापति के द्वारा अनेक बार निगम के सिविल कार्यों की गुणवत्ता संबंधित शिकायतें की गईं परंतु महापौर और महापौर परिषद ने इसे राजनैतिक दुष्प्रचार  ठहरा कर कभी भी उन मामलों की जांच कराने की ज़हमत नहीं उठायी। कुछ मामलों की शिकायतें जिला प्रशासन के सामने लोगों ने उठाईं , जिनपर जिलाधीश के निर्देशों पर जांच की गई और मामलों की लीपा पोती कर उनके सही होने की रिपोर्ट पेश कर दी गईं। अब वैसे अनेक निर्माणों की खराब क्वालिटी चीख चीख कर अपने दर्शन करा रही है। पूरब टाइम्स ने पूर्व में दुर्ग निगम द्वारा बनाये जा रहे जलगृह कॉम्प्लेक्स की साथ किश्तों में कच्चे चि_ों से उच्च प्रशासन व आम नागरिकों को अवगत कराने की कोशिश की है। पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट...
पूरब टाइम्स, दुर्ग। दुर्ग के इंजीनियर पहले शौचालय निर्माण जैसे छोटे मोटे मामले में अनियमितता के आरोपों में फंसते थे लेकिन अब आम जनता के जान-माल से जुड़ी , करोड़ों रुपयों से बनी पब्लिक बिल्डिंग में कोताही दिखाते हुए नजऱ आते हैं तो बेहद आश्चर्य होता है। विदित हो कि इन कार्यों को अन्य निगमों की तुलना में अच्छे रेट्स में भी ठेकेदारों को दिया गया परंतु फिर भी नाप व बिल में धांधली करना या तो निगम के इंजीनियरों की आदत बन गया है या फिर किन्हीं रसूखदारों के दबाव में ऐसे कारनामें किये जाते हैं। दुर्ग का मंडी कॉम्प्लेक्स एक बार डिफाल्ट होकर पुन: शुरू किया गया। उसके स्ट्रक्चर के बारे में भी सवाल उठने लगे थे , ऐसे में अतिरिक्त सावधानी बरतने की जगह उस पर तकनीकि अपराध करना समझ के परे है। इस मामले से जुड़े कागज़ों के आधार पर बनाई जा रही इन खबरों पर उच्च प्रशासन कब तक कार्यवाही करेगा यह तो वक़्त बताएगा परंतु जांच होना अवश्यंभावी है। 

वर्क ऑर्डर के शेड्यूल ओफ़ रेट्स (एस.ओ.आर.) के हिसाब से बिल
 नहीं बनाया गया 
सूचना के अधिकार में प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार जो वर्क ओर्डर दिया गया था क्रमांक/ लो.क. वि./ 2016/51 जिसका दि. 12/07/2016 था। इसे अवर सचिव , नगरीय प्रशासन विभाग छ.ग. शासन के स्वीकृति पत्र क्र. 3712/212/16/18 दि. 20 मई 2016 के अनुसार दिया गया था। इस कार्य की अनुमानित लागत रु.256.79 लाख (दो करोड़ छप्पन लाख उन्यासी हज़ार रु. ) थी। इसे एस.ओ.आर (तयशुदा सरकारी रेट का शेड्युल ) दि. 01.11.1999 के अनुसार 21.89प्रतिशत अधिक दर पर स्वीकृत किया गया था। जब इसका पेमेंट किया गया तो सन् 2009 के एसओआर के आधार पर किया गया। यह कार्य इंजीनियरों के द्वारा जानबूझकर किया गया या त्रुटि थी तो देखने वाली बात यह भी है कि इस काम के ऊपर दुर्ग निगम के  ऑडिटर पोद्दार एंड कंपनी ने क्यों ऑब्जेक्शन नहीं लगाया? 

एस्टीमेट से बहुत ज़्यादा का भुगतान बिना शासन के  सचिव की स्वीकृति के हुआ कैसे ?
एस्टीमेट में एसओआर के अनुसार भूतल के सिविल कार्य का खर्च 68.54 लाख तथा वाटर सप्लाई , इलेक्ट्रिकल इत्यादि का 10.28 लाख था. इसी तरह प्रथम तल के सिविल कार्य का खर्च 73.46 लाख व वाटर सप्लाई , इलेक्ट्रिकल इत्यादि का 13.22 लाख था। द्वितीय तल में सिविल कार्य का खर्च 69.98 लाख था व वाटर सप्लाई , इलेक्ट्रिकल इत्यादि का 12.59 लाख था। इस तरह से सिविल का कुल कार्य 68.54+ 73.46  + 69.98 = 211.98 था तथा अन्य कार्य का 36.03 लाख होता था.  केवल सिविल कार्य पर यदि टेंडर के अनुसार 21. 89 प्रतिशत बढ़ा दें तो लगभग 258.40 लाख का सिविल कार्य होना था। यदि हम बिल भुगतान दिनांक 13/ 08/2018 देखें तो केवल सिविल कार्य में लगभग 315.54 लाख रुपये का हो गया है। अब देखने वाली बात यह है कि सूचना के अधिकार से प्राप्त कागज़ों के आधार पर किसी भी नोटशीट पर इसका कोई उल्लेख नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि ऐसी मनमानी का सहयोग व अनदेखी करने वालों पर कार्यवाही होती है या नहीं।