इतनी ठंड पड़ रही है ऐसे में सफ ाई का मतलब रोज़ नहाना नहीं होता है

Posted on: 28-01-2019

पूरे देश में मोदीजी ने सफाई अभियान चलाकर युवाओं को फंसा दिया है। अब शहर मुहल्ला और घर में जो देखो वो सफाई रखने पर भाषण देने लगता है . इधर ठंड से परेशान बैठा ही था कि मुझे वाट्सअप पर मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज के एक साथी ने मैसेज भेजा। सचमुच , मुझे अपने इंदौर वाले जीएसआईटीएस के हॉस्टल के दिन याद आ गए। हॉस्टल में सफाई से रहने का मतलब होता था कि आप उस हॉस्टल बिरादरी से गद्दारी कर रहे हो। हॉस्टल का लड़का कोई भी काम करने के पहले खुद से तीन सवाल पूछता था - पहला क्या इसे करने से कोई लड़की इम्प्रेस हो जाएगी ? दूसरा, क्या इससे मेरे कैरियर को कोई फायदा हो सकता है ? और तीसरा क्या इस काम को टाला जा सकता है ? बिना फायदे के सिर्फ सभ्य दिखने की खातिर कुछ करने की दलील उन्हें इम्प्रेस नहीं कर पाती थी। इस बारे में ज़्यादा कहा जाए तो उन्हें घबराहट होने लगती थी । ऐसा लगता था कि कोई कनपटी पर बन्दुक रख जबरन उनकी मजऱ्ी के खिलाफ काम करवा रहा है। कॉलेज से हॉस्टल आने के बाद अपने कपड़े सहेजकर रखना (ज़्यादा से ज़्यादा खूंटी पर टांग सकता है, वह भी आराम करने के बाद), जूते मोज़े सलीके से रखना, नहाने के बाद तौलिया बाहर रस्सी पर टंगाना (ज़्यादा से ज़्यादा कुर्सी पर डाल सकता है), कमरे में खाना खाने के बाद तुरंत डब्बा और हाथ रगड़कर धोना बेहद मुश्किल से किये जा सकने वाले काम थे । वरना कागज़ या गंदे कपड़े से हाथ पोंछकर पड़े पड़े सोना अच्छा लगता था। बिस्तर पर भी उतनी ही जगह साफ़ करते थे, जितनी पर बैठा जा सके। यदि सोना होता था तो बिस्तर का सभी सामान उठाकर टेबल पर आसानी से एडजस्ट कर लेते थे । छुटियों में घर पर भी लौटते , तो जो बात इन्हे सबसे ज़्यादा परेशान करती थी, वह यह थी कि पैरेंट्स रोज़ नहाने की जि़द करेंगे। हॉस्टल में तो बड़ी आसानी से 5-7 दिन बिना नहाये निकाल लेते थे । तभी नहाते थे जब किसी लड़की से मिलना हो, कोई प्रैक्टिकल या वायवा हो, किसी रिश्तेदार के यहां या अन्य प्रोग्राम में जाना हो अथवा बदन के पसीने की बदबू, डियोडरेंट लगाने के बावजूद खुद को भी सहन ना हो पाये। आज तक , होस्टल रहवासियों ने उसी पम्र्परा को निभाया है . बस , एक फकऱ् आया है , एक ही जगह है जिसकी साफ- सफाई का पूरा ख्याल रखा जाता है । बिना नागा, बिना गलती, बिना किसी के याद दिलाये, बिना अलार्म लगाए, जिसे वे हमेशा छोड़ते वक्त साफ़ कर देते हैं, वह जगह है उनके कम्प्यूटर की ब्राउसिंग हिस्ट्री। अब कोई मोदीजी को कॉलेज के हॉस्टल और रूम लेकर रहने वाले युवाओं की व्यथा से सहमत कराये तो सबके बेचैन दिल को भी करार मिलेगा कि सफाई का मतलब रोज़ नहाना नहीं होता।