Article 370 की शुरुआत, जून से चल रही थी प्लानिंग

Posted on: 06-08-2019

नई दिल्ली। आर्टिकल 370 हटाने के मोदी सरकार के फैसले को ऐतिहासिक बताया जा रहा है। अमित शाह ने जैसे ही राज्यसभा में इसका ऐलान किया, लोगों को समझ आ गया कि बीते दिनों से कश्मीर में चल रहे घटनाक्रम के पीछे क्या कहानी थी। जानिए पूरी प्लानिंग के बारे में - पहला कदम: इसकी शुरुआत जून के तीसरे सप्ताह में हुई थी। तब जम्मू-कश्मीर के नए मुख्य सचिव के रूप में छत्तीसगढ़ कैडर के 1987 बैच के ढ्ढ्रस् अधिकारी बीवीआर सुब्रमण्यम को वहां भेजा गया था। सुब्रमण्यम पहले प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव के रूप में काम कर चुके हैं। एक्शन में शाह: इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और एक कोर टीम के साथ मिलकर पूरे मामले के कानूनी प्रभाव की समीक्षा की। कदमों को कानूनी रूप से पुख्ता करने के बाद सरकार ने घाटी की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया। अजीत डोभाल की एंट्री: हालात का आंकलन करने के लिए जुलाई के तीसरे हफ्ते में खुद अजीत डोभाल श्रीनगर पहुंचे। डोभाल तीन दिन तक वहां रहे। उनके वापस लौटते ही 27 जुलाई को ष्टक्रक्कस्न की अतिरिक्त 100 कंपनियों को श्रीनगर भेजने का आदेश जारी हुआ। जाहिर है इससे कयासों का दौर शुरू हो गया। बड़े कदम: इसके बाद आतंकी हमले की आशंका जताते हुए अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को वापस लौटने को कह दिया गया। हृढ्ढञ्ज व अन्य शैक्षिक संस्थाओं में पढऩे वाले छात्रों के साथ-साथ राज्य में काम करने वाले बाहर के लोगों को निकालने का काम शुरू हो गया। तब तक साफ हो गया था कि सरकार जम्मू-कश्मीर को लेकर कुछ बड़ा कदम उठाने जा रही है। महबूबा मुफ्ती व फारूक अब्दुल्ला समेत अन्य नेता एकजुट होने लगे, लेकिन तबतक देर हो चुकी थी। आधी रात को बड़ा काम: रविवार की रात प्रमुख राजनेताओं की नजरबंदी, मोबाइल और लैंडलाइन सेवाओं को बंद करने, धारा-144 और घाटी में कफ्र्यू लागू होने के बाद साफ हो गया कि सोमवार का दिन जम्मू-कश्मीर के लिए ऐतिहासिक होने वाला है। यह अलग बात है कि कैबिनेट के फैसले तक किसी को भी इसकी भनक नहीं लगी। गृह मंत्री अमित शाह ने हर मसले पर पुख्ता तैयारी के बाद यह कदम उठाया। कमजोरियों को ही बनाया हथियार: प्रस्तावों और विधेयकों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की आशंका को देखते हुए पूरी तैयारी की गई। इसके लिए अनुच्छेद 370 के भीतर मौजूद कमजोरियों को हथियार बनाया गया। जम्मू-कश्मीर विधानसभा नहीं होने की स्थिति में राज्यपाल ने अनुच्छेद 370 के तहत मिले अधिकार का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति से अनुच्छेद 35ए के विशेष अधिकार देने वाले अनुबंधों को निरस्त करने की अनुशंसा की। इसके साथ ही अनुच्छेद 370 के अस्थायी रूप से संविधान में शामिल किए जाने और जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की अनुशंसा पर इसे निरस्त करने के प्रावधान को हथियार बनाया गया। बताया गया कि जम्मू-कश्मीर में संविधान सभा की जगह विधानसभा ले चुकी है। विधानसभा नहीं होने की स्थिति में यह अधिकार राज्यपाल के पास आ जाता है। राज्यपाल ने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए पूरे 370 को निरस्त करने की अनुशंसा कर दी। कैबिनेट से इन अनुशंसाओं पर मुहर लगने के बाद राष्ट्रपति ने इन्हें निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया। राष्ट्रपति के दोनों आदेशों को संसद की मंजूरी के लिए दो प्रस्तावों के रूप में राज्यसभा में पेश किया गया।