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जिसे सब छुपाते है उसे हम छापते है



पूरब टाइम्स। दुनिया अजीबोगरीब चीजों से भरी पड़ी है. कभी-कभी तो कुछ जंतुओं और क्रिएशन को देखकर हर कोई हैरान रह जाता है कि आखिर ये हैं क्या. ऐसा ही कुछ इन दिनों एक अलग से दिखनेवाले कीड़े को देख कर लोग कह रहे हैं. सोशल मीडिया पर इन दिनों ऐसा ही एक कीड़ा छाया हुआ है जिसे देखकर लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ये किस प्रजाति का है. यह कीड़ा बिल्कुल एक हरी पत्ती की तरह दिखाई देता है. लोग उसके बारे में तरह तरह के कयास लगा रहे हैं, पर असल में वो क्या है ये किसी को नहीं पता.

इन्टरनेट पर इन दिनों एक बड़ी पत्ती वाले कीट को देखकर लोग हैरान हो रहे हैं. यह कीड़ा बिल्कुल एक हरी पत्ती की तरह दिखाई देता है, जिसे देखने के बाद आपको पहचान पाना मुश्किल होगा कि असल में कीड़ा है या पत्ती. इस कीड़े के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल  हैं. इसे देखकर ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता कि ये कोई कीड़ा है. पहली नजर में आपको ऐसा ही लगेगा कि ये कोई हरी पत्ती है जो किनारों पर सूख गयी है.

अब आपको इस कीट के बारे में बताते हैं. इस कीड़े को  Phyllium Giganteum के नाम से जाना जाता है. इस प्रजाति में केवल मादाएं ही होती हैं . Phyllium Giganteum  बेहद ही चौड़ी और लंबी होती है. इसके शरीर का आकार बिल्कुल पत्ती जैसा होता है. कीट की त्वचा भी हरे रंग की होती है, साथ में किनारों पर भूरे रंग का स्पॉट बना होता है. कीट के आगे की ओर भी दो भूरे रंग के धब्बे बने होते है. इसे देखकर ऐसा लगता है मानो पत्ती उस जगह पर सूख गई है. इसकी लंबाई करीब 10 सेंटीमीटर होती है

पूरब टाइम्स। सिंगल माल्ट व्हिस्की को दुनिया की सबसे महंगी व्हिस्की में गिना जाता है। इसे बनाने में काफी मेहनत और समय लगता है। यही एक बड़ी वजह है, जिसके चलते सिंगल माल्ट व्हिस्की को देश दुनिया में काफी पसंद किया जाता है। इसी कड़ी में आज हम इस व्हिस्की के बारे में जानेंगे। दुनिया भर में इसके कई वैरायटीज उपलब्ध हैं, जिन्हें लोग खूब पसंद करते हैं। इन वैरायटीज के प्राइस भी अलग अलग होते हैं। इस व्हिस्की की कीमत जानने के बाद आप हैरान हो जाएंगे। सिंगल माल्ट के एक बोतल का दाम इतना है कि उसमें आप लाखों का घर खरीद सकते हैं। इसे बनाने के लिए जौ का इस्तेमाल किया जाता है। सिंगल माल्ट को बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले जौ को जमीन के पानी में मिलाया जाता है। उसके बाद इसे 64 सेंटीग्रेट तापमान पर गर्म किया जाता है। 

सिंगल माल्ट व्हिस्की को बनाना कोई आसान काम नहीं है। इसे तैयार करने में काफी लंबा समय लगता है। सर्वप्रथम जौ को पानी में मिलाने के बाद इसको इतना गर्म किया जाता है जब तक ये चीनी में ना बदल जाए। मीठे लिक्विड में तैयार हुए इस वोर्ट को बाद में ठंडा किया जाता है। उसके बाद इसे वॉश बैक्स में डाला जाता है तत्पश्चात उसको डिस्टिलेशन के लिए कॉपर वॉश स्टिल्स में गर्म किया जाता है। उसके बाद दोबारा उसे स्पिरिट स्टिल्स में गर्म किया जाता है। सिंगल माल्ट व्हिस्की को बनाने में कई सालों की मेहनत लगती है। बात अगर इसकी कीमत की करें तो ये करीब 30,000 अमेरिकी डॉलर तक हो सकती है। कुछ समय पहले सिंगल माल्ट मैकलान 1926 की एक बॉटल 1.5 मिलियन डॉलर में बिकी थी।

ये व्हिस्की करीब 30 साल पुरानी होती हैं। इस कारण 30 से 40 फीसद अल्कोहल इस दौरान इवैपोरेट हो जाता है। व्हिस्की जितनी पुरानी होती है, उसकी कीमत भी उतनी ही ज्यादा होती है। ऐसा उसके एंजल्स शेयर के कारण होता है। एंजल्स शेयर लिक्विड का वो प्राकृतिक वाष्पीकरण होता है, जो समय के साथ साथ पर्यावरण में घुलता जाता है। इसी वजह से व्हिस्की जितनी पुरानी होती है, उतनी ही शानदार भी। यही एक बड़ी वजह है, जिसके चलते सिंगल माल्ट व्हिस्की की कीमत काफी ज्यादा है। इस व्हिस्की का एंजल्स शेयर ही उसको काफी खास बनाता है। बात अगर स्कॉटलैंड की करें तो वहां का मौसम काफी ठंडा रहता है। इस कारण वहां पर वाष्पीकरण की रफ्तार काफी धीमी होती है। इसी वजह से स्कॉटलैंड में व्हिस्की को 60 सालों तक रखा जाता है, जिसके चलते उसका एंजल्स शेयर काफी कम हो जाता है। इस कारण सालों बाद प्रोडक्ट काफी बेहतरीन बन कर सामने आता है।

पूरब टाइम्स। पृथ्वी पर ऐसी कई प्राचीन संरचनाएं मौजूद हैं, जो अपने भीतर ना जाने कितने राज को दफन किए हुए हैं। उन्हीं में से एक है गीजा का पिरामिड। इनका निर्माण आज से लगभग 4 हजार साल पहले हुआ था। इजिप्ट में स्थित ये पिरामिड कई रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन पिरामिडों का लंबे समय तक अध्ययन करने के बाद भी पुरातत्वविद इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं कि उस दौर में इसे बनाया कैसे गया था? प्राचीन समय में जब इंसानी सभ्यता अपने विकास और उत्थान के मार्ग को खोज रही थी। उस वक्त इतनी विशाल संरचना को खड़ा करना वाकई ताज्जुब करने वाली बात है। लगभग 4 हजार वर्ष पहले जब इंसान के पास उत्तम किस्म के औजार तक नहीं थे। उस दौर में इतने बड़े ढांचे को बनाना बात समझ के परे है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि गीजा का पिरामिड इंसानों ने नहीं बल्कि एलियंस ने बनाया था। हालांकि उनकी बातों में कितनी हकीकत है और कितना फसाना। ये कोई नहीं जानता। 
आपको बता दें कि पिरामिड में लगे हर एक मोनोलिथ ब्रिक का वजन करीब 2 टन है। वहीं कुछ मोनोलिथ ब्रिक का वजन 50 टन तक है। प्राचीन मिस्र के लोगों को उस दौरान पहिये के इस्तेमाल की जानकारी नहीं थी। ऐसे में सवाल उठता है कि उन्होंने इन भारी भरकम पत्थरों को नील नदी की दूसरी तरफ से इस तरफ लाकर कैसे पिरामिड का निर्माण किया? आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन गीजा के तीनों पिरामिड ओरायन बेल्ट के तीनों सितारों के साथ श्रेणीबद्ध तरीके से एलाइन्ड हैं। आज से लगभग 4 या 5 हजार साल पहले प्राचीन मिस्र के लोगों को अंतरिक्ष के विषय में कुछ भी पता नहीं था। ऐसे में उन्होंने पिरामिड को ओरायन बेल्ट के इन तीन सितारों के साथ मेल बनाकर कैसे निर्मित किया? ये आज तक एक रहस्य का विषय बना हुआ है।

पिरामिड की दीवारों पर कई हीरोग्लिफ मिले हैं, जिनमें हैलिकॉप्टर, अंतरिक्षयान जैसे आधुनिक चीजें अंकित हैं। यही नहीं इनमें सबमरीन और स्पेसशिप जैसे आधुनिक वाहन भी देखे जा सकते हैं। इसी वजह से कई कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट्स का कहना है कि प्राचीन मिस्र के लोगों का परग्रही जीवन के साथ संबंध था। पिरामिड के अंडरग्राउंड की दीवारों पर एक चित्र अंकित है, जिसमें ये स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि कुछ व्यक्ति बल्ब जैसे आकार की किसी चीज को उठा रखे हैं। बल्ब का आविष्कार पिछली सदी में एडीसन ने किया था। क्या प्राचीन मिस्र के लोगों को बल्ब के विषय में जानकारी थी? इस राज से भी पर्दा नहीं उठ पाया है। ऐसे ना जाने कितने रहस्य गीजा के पिरामिड के भीतर दफन हैं, जो इस ओर इशारा करते हैं कि प्राचीन मिस्र के लोगों का संपर्क परग्रही जीवन के साथ था। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है ये आज भी कोई नहीं जानता।

मध्य प्रदेश।   पन्ना  जिले में एक किसान को सरकार से पट्टे पर ली गई जमीन की खुदाई में उच्च गुणवत्ता वाला 6.47 कैरेट का हीरा मिला है. इस किसान को पिछले दो वर्षों में खुदाई में छठवीं बार हीरा मिला है. जिले के प्रभारी हीरा अधिकारी नूतन जैन ने शनिवार को बताया, कि जरुआपुर गांव की एक खदान में शुक्रवार को प्रकाश मजूमदार को यह हीरा मिला. उन्होंने कहा कि 6.47 कैरेट के इस हीरे को आगामी नीलामी में बिक्री के लिए रखा जाएगा और कीमत सरकार के दिशा निर्देशों के अनुसार तय की जाएगी.

मजूमदार ने कहा, कि नीलामी से प्राप्त राशि को वह खनन में लगे अपने चार भागीदारों के साथ साझा करेंगे. उन्होंने शुक्रवार को पत्रकारों से कहा, हम पांच साझेदार हैं. हमें 6.47 कैरेट का हीरा मिला है. जिसे हमने सरकारी हीरा कार्यालय में जमा करा दिया है. मजूमदार ने कहा, कि उन्हें पिछले साल 7.44 कैरेट का हीरा मिला था. इसके अलावा उन्हें पिछले दो वर्षों में 2 से 2.5 कैरेट के चार अन्य कीमती हीरे भी खनन में मिले थे.

अधिकारियों ने कहा, कि कच्चे हीरे की नीलामी की जाएगी और इससे होने वाली आय को सरकारी रॉयल्टी और करों की कटौती के बाद किसान को दिया जाएगा. निजी अनुमान के अनुसार नीलामी में 6.47 कैरेट के हीरे की कीमत करीब 30 लाख रुपये हो सकती है. मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में स्थित पन्ना जिले में लगभग 12 लाख कैरेट के हीरे का भंडार होने का अनुमान है. प्रदेश सरकार पन्ना हीरा आरक्षित इलाकों में स्थानीय किसानों और मजदूरों को हीरों के खनन के लिए जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े पट्टे पर देती है. खनन में प्राप्त हीरों को किसान या श्रमिक, जिला हीरा अधिकारी के पास जमा कराते हैं.

केरल। दुनिया में कई अजीबो-गरीब घटनाएं घटित होती हैं, जो देश-विदेश में खूब सुर्खियां बटोरती हैं। ये घटनाएं इतनी विचित्र होती हैं। दुनिया में कई अजीबो-गरीब घटनाएं घटित होती हैं, जो देश-विदेश में खूब सुर्खियां बटोरती हैं। ये घटनाएं इतनी विचित्र होती हैं कि सुनने के बाद भी इन पर विश्वास नहीं होता है। इसी कड़ी में आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी जगह के बारे में जहां पर ज्यादातर बच्चे जुड़वां ही पैदा होते हैं। ये जगह भारत के केरल राज्य में मलप्पुरम जिले के कोडिन्ही गांव में स्थित है। गांव के इस अनोखेपन की चर्चा पिछले लंबे समय से देश दुनिया में की जा रही है। अक्सर कई लोग यहां के जुड़वां लोगों को देखने के लिए दूर दूर से इस गांव में आते हैं। गांव के अधिकांश परिवारों के भीतर जुड़वां बच्चे ही जन्म लेते हैं। आखिर गांव में इतने सारे जुड़वां बच्चे क्यों पैदा होते हैं? इस बात की पड़ताल करने के लिए कई बार वैज्ञानिकों का दल गांव में आया, लेकिन वे इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा पाए। 

 आइए जानते हैं इस रहस्यमय गांव के बारे में -यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि इस गांव के ऊपर ईश्वर की एक विशेष कृपा है, जिसके चलते अधिकतर बच्चे जुड़वां जन्म लेते हैं। आपको बता दें कि पिछले 50 सालों के दौरान इस गांव में करीब 300 से भी ज्यादा जुड़वां बच्चों ने जन्म लिया है। गांव का ये आश्चर्यजनक पहलू पिछले लंबे समय से खूब सुर्खियां बटोर रहा है। अगर आप कोडिन्ही गांव में भ्रमण करने के लिए जाते हैं, तो आपकी मुलाकात एक बड़ी संख्या में जुड़वां लोगों से होगी। कुछ अनुमानों की मानें तो इस गांव में करीब 400 जुड़वां लोग रहते हैं। आखिर इस गांव में इतने जुड़वां लोग क्यों हैं? इस अनोखे रहस्य का पता लगाने के लिए साल 2016 में एक टीम गांव में आई। उन्होंने गांव के जुड़वां लोगों के सैम्पल्स को इकट्ठा किया।

हालांकि इस रिसर्च के बाद भी कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला। वहीं कई लोगों का कहना है कि इस गांव की हवा पानी में कुछ ऐसा है जिसके चलते यहां के ज्यादा लोगों के घर जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं। यही नहीं विशेषज्ञों ने यहां पर रहने वाले लोगों के खानपान और रहन सहन पर भी गहन अध्ययन किया। उसके बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा। गांव में इतने जुड़वां बच्चे क्यों जन्म लेते हैं? ये आज भी एक रहस्य का विषय बना हुआ है।

आप में से कई लोगों ने इटली के महान दार्शनिक और पेंटर लिओनार्दो दा विंची के बारे में जरूर सुना होगा। यूरोपीय पुनर्जागरण काल में कई महान दार्शनिक हुए, जिनमें से वे एक थे। इनके द्वारा बनाई गई पेंटिंग मोनालिसा आज भी एक मिस्ट्री बनी हुई है। आखिर इस पेंटिंग में ऐसा क्या है, जिसे लेकर कई विशेषज्ञ इसमें काफी खोजबीन कर रहे हैं? इसी सिलसिले में आज हम इस पेंटिंग के रहस्य को जानने की कोशिश करेंगे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आज इस पेंटिंग की कीमत करीब 867 मिलियन डॉलर है, जिसकी वैल्यू भारत में करीब 6.4 हजार करोड़ रुपये है। लिओनार्दो दा विंची ने इस पेंटिंग को साल 1503 में बनाना शुरू किया था। साल 1517 तक आते आते भी उन्होंने इस पेंटिंग को बनाना जारी रखा। लिओनार्दो को सबसे ज्यादा दिक्कत मोनालिसा के होंठ को बनाने में आ रही थी। मोनालिसा के सिर्फ होठ को बनाने में उन्होंने करीब 12 साल लगा दिए।  

मोनालिसा की पेंटिंग का सबसे बड़ा रहस्य उसकी मुस्कान का है। पिछले लंबे समय से कई विशेषज्ञ उसकी रहस्यमय मुस्कान का अध्ययन कर रहे हैं। मोनालिसा की ये रहस्यमय मुस्कान अलग अलग एंगल्स से देखने पर अलग अलग दिखती है। अगर आप किसी एक एंगल से इसे देख रहे हैं, तो ये मुस्कान हंसती हुई दिखेगी। वहीं दूसरे एंगल से देखने पर उसकी मुस्कान फीकी पड़ जाती है।

कहा ये भी जाता है कि लिओनार्दो ने जिस औरत की ये पेंटिंग बनाई है। वह अपने भीतर किसी राज को छुपाए हुए है। इसी वजह से मोनालिसा की मुस्कान काफी रहस्यमय है। कुछ सालों पहले एक डॉक्टर ने इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए ये कहा था कि मोनालिसा के ऊपर के दो दांत टूटे हैं। इस वजह से उसका ऊपरी होंठ थोड़ा सा अंदर की तरफ दबा हुआ है।

साल 2000 में हार्वर्ड के एक न्यूरोसाइंटिस्ट ने मोनालिसा की इस पेंटिंग पर रिसर्च करने के बाद ये बताया कि मोनालिसा की मुस्कान कभी भी नहीं बदलती बल्कि आपका माइंडसेट जैसा रहता है। वैसे ही मोनालिसा की पेंटिंग आपको दिखती है। अगर आप खुश हैं, तो आपको मोनालिसा मुस्कुराते हुए दिखेगी। वहीं अगर आप दुखी हैं तो मोनालिसा की ये मुस्कान फीकी पड़ जाएगी।

हालांकि आज भी इस बात का पता नहीं लग पाया है कि मोनालिसा कौन थी? अर्थात जिस लड़की की तस्वीर को लिओनार्दो ने बनाया था वो लड़की भी इस पेंटिंग की तरह रहस्य ही है। वहीं एक थ्योरी का ये कहना है कि मोनालिसा कोई और नहीं बल्कि खुद लिओनार्दो ही थे। इस पेंटिंग में लिओनार्दो ने खुद को एक औरत के रूप में बनाया था। ये अब तक की सबसे कीमती पेंटिंग है, जिसका मूल्य करीब 867 मिलियन डॉलर है। इसकी कीमत भारत में करीब 6.4 हजार करोड़ रुपये है।

बेंगलुरु। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नहीं, तीन महाविशाल ब्लैक होल खोजे हैं। ये सभी आपस में जुड़ीं गैलेक्सीज में पाए गए हैं। यह एक दुर्लभ घटना होती है और ताजा स्टडी से यह साफ हुआ है कि इस तरह आपस में विलय के बाद बने गैलेक्सी समूह में इन्हें देखे जाने की संभावना ज्यादा है। डिपार्टमेंट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नॉलजी ने बताया कि महाविशाल ब्लैक होल डिटेक्ट करना मुश्किल होता है क्योंकि इनसे कोई रोशनी नहीं निकलती है लेकिन आसपास के ब्रह्मांड पर इनके असर से इन्हें डिटेक्ट किया जा सकता है। 
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ऐस्ट्रोफिजिक्स के रिसर्चर्स की टीम ने फ्रांस के रिसर्चर्स के साथ मिलकर यह स्टडी की। भारत की ओर से इसमें ज्योति यादव, मौसुमी दास और सुधांशु बार्वे शामिल थे। वे NGC 7733 और NGC 7734 को स्टडी कर रहे थे जब उन्हें NGC7734 के केंद्र से कुछ अजीब उत्सर्जित होता दिखा।ऐसा ही कुछ NGC7733 के आर्म के पास चमकीला सा नजर आया। इसकी गति गैलेक्सी से अलग थी।
वैज्ञानिकों ने माना कि यह एक छोटी गैलेक्सी थी जिसे NGC7733N नाम दिया गया। ऐस्ट्रॉनमी ऐंड ऐस्ट्रोफिजिक्स में छपी स्टडी में भारत की पहली स्पेस ऑब्जर्वेटरी ASTROSAT पर लगे Ultra Violet Imaging Telescope का डेटा इस्तेमाल किया गया था। इसके अलावा चिली के वेरी लार्ज टेलिस्कोप में लगे MUSE टेलिस्कोप और दक्षिण अफ्रीका में लगे ऑप्टिकल टेलिस्कोप से मिलीं इन्फ्रारेड तस्वीरों को भी स्टडी किया।
इन गैलेक्सीज के केंद्र में महाविशाल ब्लैक होल भी हैं। दो गैलेक्सीज के विलय के साथ ही इनमें मौजूद ब्लैक होल भी एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं लेकिन इनका विलय नहीं हो पाता। किसी तीसरे ब्लैक होल की मौजूदगी में ये अपनी ऊर्जा उसे ट्रांसफर करते हैं और आपस में मिल जाते हैं। इस तरह की गैलेक्सीज में दो ब्लैक होल तो देखे गए हैं लेकिन पहली बार 3 महाविशाल ब्लैक होल पाए गए हैं।



आपको जानकर हैरानी होगी कि इस गांव के लोग सदियों से इस अजब-गजब परंपरा को निभाते चले आ रहे हैं. ऐसे में अगर इस गांव के लोगों को बाहर जाना होता है तो हाथ में चप्पल लेकर गांव की सीमा के बाहर जाने के बाद उसे पहनते हैं और फिर जब वापस आते हैं तो गांव की सीमा से पहले ही जूता चप्पल उतार देते हैं. ऐसे में यहां के लोग जूते -चप्पल पहनने के नाम पर नाराज भी हो जाते हैं.

पूरब टाइम्स। लॉटरी का टिकट  किसी जुए से कम नहीं होता है. किस्मत अच्छी हुई तो जीत सकते हैं वर्ना सालों तक लोग उम्मीद का दामन थामे खेलते रह जाते हैं. हाल ही में अमेरिका  के रहने वाले एक शख्स ने लॉटरी में जैकपॉट जीता है. आप सोच रहे होंगे कि यह तो आम बात है, हर दिन लॉटरी के इतने टिकट खुलते हैं, कोई न कोई तो जीतेगा ही. दरअसल, यह शख्स 1991 से एक ही सेट के टिकट खरीद रहा था. यह खबर दुनियाभर में वायरल हो रही है

किस्मत पर था यकीन कुछ लोग अपनी धुन के पक्के होते हैं. जिद में वे लगातार कुछ ऐसा ही करते रहते हैं, जिसमें उन्हें कभी न कभी सफल होने की पूरी उम्मीद होती है. इस शख्स के साथ भी कुछ ऐसा ही था. हालांकि, लॉटरी टिकट  में कोई भी कभी अपनी जीत के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकता है. मगर इस शख्स के यकीन की तो दाद देनी पड़ेगी. अमेरिका  के मिशिगन  में रहने वाला यह शख्स 1991 से यानी पिछले 30 सालों से लॉटरी टिकट का सेम सेट खरीद रहा था.

जैकपॉट मिलने पर नहीं हुआ यकीन 61 वर्षीय इस शख्स के नाम का खुलासा नहीं किया गया है. लॉटरी जीतने के बाद शख्स ने अधिकारियों को बताया- मैं 1991 से एक ही सेट के टिकट खरीद रहा था लेकिन आज तक जीत नसीब नहीं हुई थी. मैंने कई बार नंबर बदलने के बारे में भी सोचा लेकिन फिर जिद में इसी सेट पर टिका रहा. आज 18.41 मिलियन डॉलर की लॉटरी जीतने पर मुझे बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा है. आपकी जानकारी के लिए बता दें, भारतीय करेंसी में यह रकम 1,36,48,77,818 रुपये के लगभग है. सेट हो गई पूरी जिंदगी शख्स ने जीती गई रकम में से 11.7 मिलियन डॉलर कैश में लेने का फैसला किया है. इस रकम का कुछ हिस्सा वह अपने परिवार को देगा, कुछ दान करेगा और बाकी को सेव करेगा.

पूरब टाइम्स. दुनिया में एक ऐसा छोटा गांव है, जहां पर साल में तीन महीने तक अंधेरा छाया रहता है. इस वजह से वहां के लोगों में कई तरह की बीमारियां होने लगी. अंधेरे से निजात पाने के लिए इस गांव के लोगों ने अपना खुद का सूरज बना लिया. सूरज की रोशनी नहीं मिल पाने के कारण पूरा गांव तीन महीने तक अंधेरे में रहता था. फिलहाल, चलिए यह जानते हैं कि आखिर इस गांव में साल के तीन महीने अंधेरा क्यों रहता है.

 इटली के उत्तरी इलाके में मौजूद विगनेला  गांव चारों तरफ पहाड़ों और घाटियों से घिरा हुआ है. जब भी ठंड आती है तो यहां पर सूर्य की किरणें नहीं आ पाती. जिस कारण करीब तीन महीने नवंबर से लेकर फरवरी तक अंधेरा ही रहता है.  इस दौरान गांव में सूरज की किरणें नहीं पहुंचने पर लोगों को कई बीमारियों से गुजरना पड़ता था. सूरज की किरणों की कमी के कारण गांव के लोगों को निगेटिव इम्पैक्ट अनिद्रा, मूड खराब रहना, एनर्जी लेवल कम होना, क्राइम रेट बढ़ने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता था.

इस बारे में डॉक्टर करन राज ने बताया है कि कैसे एक गांव बिना सूरज की रोशनी से तमाम समस्याओं से जूझता था. इससे बचने के लिए गांव के लोगों ने खुद का ही सूरज बना डाला विगनेला  गांव ने साल 2006 में 100,000 यूरो (उस समय लगभग 87 लाख) की लागत से 8 मीटर लंबा और 5 मीटर चौड़ा ठोस स्टील शीट का निर्माण किया. ऐसा करने के बाद सूरज की रोशनी सीधे इस स्टील शीट पर पहुंचती है जो गांव में अच्छी रोशनी प्रदान करती है. 

पूरब टाइम्स। मौत कब और कैसे आ जाए, कहा नहीं जा सकता. मौत इंसान की जिंदगी में किसी भी रास्ते से आ जाती है. दुनिया में हर साल करीब 1 लाख से अधिक लोगों की मौत सांप  के काटे जाने से होती है. लेकिन जिन्दा होते हैं और अपने जहर से इंसान (Venom Of Snake) को मार डालते हैं. लेकिन हाल में चीन से सामने आए एक मामले में एक कोबरा ने शेफ को अपनी मौत के 20 मिनट बाद डस  कर मार डाला. सांप का कटा हुआ सिर प्लेट में सर्व किया गया था. और उसी प्लेट से सांप ने शेफ को डस लिया.

ये अजीबोगरीब मामला चीन  से सामने आया है. साउथ चाइना में कोबरा सांप के स्किन से बने सूप को बड़े चाव से पिया जाता है. इस खतरनाक सांप के स्किन को हटाकर उसके मांस को पकाकर उससे सूप बनाया जाता है. लेकिन चीन के फोशन  में रहने वाले शेफ पेंग फैन  के लिए कोबरा सूप बनाना जानलेवा साबित हुआ. कोबरा सूप बनाने के दौरान उसकी मौत हो गई वो भी मरे हुए सांप के काटने के कारण.





पूरब टाइम्स। अमेरिका में एक मछुआरे को ऐसी मछली मिली है जिसे देखकर लोग जितने हैरान हैं, उतने ही डरे हुए भी हैं। दरअसल, यहां ऐसी मछली मिली है जिसके दांत इंसानों जैसे हैं। इस अजीब सी दिखने वाली मछली की तस्वीर Jennettes Pier ने फेसबुक पर शेयर की है। पोस्ट के मुताबिक नेथन मार्टिन नाम के मछुआरे के हाथ यह मछली लगी है जिसका नाम शीपहेड (Sheephead) है। शीपहेड फिश आमतौर पर चट्टानों, मूंगों और पुलों के पास पाई जाती हैं। इनके ऊपर काली और सफेद धारियां बनी हुई हैं। एक तस्वीर में शीपहेड मछली के ऊपर और नीचे के दांत साफ नजर आ रहे हैं जों इंसानों जैसे दिख रहे हैं।  


ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं और लोग इस अनोखी मछली को देखकर हैरान हैं। किसी ने इसे डरावना बताया है तो किसी ने कहा है कि इस मछली के दांत उनसे अच्छे हैं। इससे पहले फरवरी में मेलबर्न के पास एक मछुआरे को भी ऐसी ही मछली दिखी थी। पॉल लोर ने बताया था कि दिखने में इस मछली के दांत भले ही दिखने में इंसानों जैसे हैं, अंदर की ओर ये शार्क के दातों जैसे हैं।


भोपाल। कोरोना संक्रमण के कारण हुए लॉकडाउन में सबसे ज्यादा परेशानी कलाकारों को हुई है। राजधानी भोपाल में डिंडोरी के कई गोंड चित्रकार रहते हैं, जो अपनी कला के माध्यम से अपनी आजीविका चलाते हैं। इन्हीं में से एक हैं बालमती टेकाम। हालात ऐसे हो गए थे कि बालमती को अपनी चार साल की बेटी की मिठाई की मांग को पूरा करने के लिए साइकिल बेचनी पड़ी थी। थोड़े दिन बाद एक संस्था की मदद से उन्होंने अपनी बादल वाले आसमान समेत सात पेंटिंग्‍स इंटरनेट मीडिया पर डालीं और तीन घंटे में ही इनके ग्राहक मिल गए। बालमती की ये पेंटिंग्स 45 हजार रुपये में बिकी हैं। इन पैसों से उन्‍होंने अपने घर का किराया और परिचितों से लिया उधार चुकाया है। बालमती ने अब ऑनलाइन माध्यम को ही पेंटिंग बेचने का जरिया बना लिया है।

बालमती डिंडोरी का रहने वाली हैं, लेकिन वह पिछले दस साल से बाणगंगा इलाके में किराए के मकान में रह रही हैं। उनके परिवार में पति और दो बच्‍चे हैं। छह साल का बेटा और चार साल की बेटी। कोरोना काल से पहले बालमती ट्राइबल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (ट्राइफेड) के लिए काम कर रही थीं। उन्हें ट्राइफेड को पेंटिंग देने के बदले सालाना करीब 25,000 रुपये मिलते थे। उनके पति इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते थे, उन्हें 8,000 रुपये प्रतिमाह मिलते थे। बालमती का जीवन सुचारू रूप से चला, लेकिन महामारी ने उनके पति की नौकरी छीन ली और ट्राइफेड ने पेंटिंग लेना भी बंद कर दिया। पिछले दिनों चार महीने तक किराया नहीं देने पर मकान मालिक ने मकान खाली करने को कहा। वे तीन हजार रुपये महीना मकान किराया नहीं दे पा रहे थीं।

बादल वाले आकाश से फूटी आशा की किरण : फिर, बादल वाले आकाश में आशा की एक किरण फूट पड़ी। वह बताती हैं कि मैंने सामाजिक कार्यकर्ता पूजा अयंगर से संपर्क किया और उन्हें अपनी समस्याओं के बारे में बताया। उन्होंने पहले हमें राशन दिया। फिर इंटरनेट मीडिया के माध्यम से पेंटिंग बेंचने के लिए कहा। बालमती कहती हैं कि पूजा मैडम उनके लिए एक फरिश्ता बनकर आईं, क्योंकि जब उन्हें सबसे ज्यादा मदद की जरूरत थी तब उन्होंने मदद की।

आदिवासी महिला कलाकार का कहना है कि उन्‍होंने इन पैसों से घर का किराया और कर्ज चुकाया, जो अपने परिचितों से लिया था। उसने कैनवास और रंग भी खरीदे हैं। बालमती कहती हैं कि मेरे पति और मैंने गरीबी से बाहर निकलने के लिए कुछ और पैसे पाने की उम्मीद में कैनवास और कागजों पर 40 पेंटिंग्‍स बनाई हैं, जिनमें से ज्यादातर छोटी हैं। बालमती का कहना है कि उन्हें सरकार और ट्राइफेड से कोई सहयोग नहीं मिला, जबकि बरसात के दिन अभी बाकी हैं। बालमती कहती हैं कि वह आगे की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं। यही उन्‍होंने अपने पूरे जीवन में किया है।

बालमती टेकाम ने हमसे संपर्क किया, तो हमने उनकी सात पेंटिंग्‍स और एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। उसके सभी काम तीन घंटे के भीतर बिक गए। खरीदार भोपाल, अमेरिका में न्यू जर्सी, गोवा, चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली से थे। पेंटिंग 45 हजार में बिकीं। हमने कलाकार को 29 हजार रुपये दिए हैं। जब हमें खरीददार से बाकी रकम मिल जाएगी, तो हम उसे भेज देंगे।

बॉलिवुड में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो बेहद प्रतिभा के बावजूद अपना मुकाम नहीं बना पाते हैं। ऐसा ही एक नाम सिंगर और ऐक्ट्रेस सुलक्षणा पंडित का है। अच्छी आवाज और खूबसूरत लुक्स वाली सुलक्षणा पंडित पिछले काफी समय से गुमनामी की जिंदगी बिता रही हैं और उनका मानसिक संतुलन भी ठीक नहीं है।@GI@

आइए, सुलक्षणा पंडित के 67वें जन्मदिन पर जानते हैं उनकी दुखभरी कहानी।
सुलक्षणा का जन्म 12 जुलाई 1954 को मशहूर संगीत घराने में प्रताप नारायण पंडित के घर में हुआ था। संगीत एक तरह से सुलक्षणा को परिवार से मिला था। उन्होंने केवल 9 साल की उम्र में सिंगिंग शुरू कर दी थी। मशहूर संगीतकार जतिन-ललित उनके छोटे भाई हैं और ऐक्ट्रेस विजेयता पंडित छोटी बहन हैं। बाद में सुलक्षणा ने फिल्मों में भी गाना शुरू कर दिया। उन्होंने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे सिंगर्स के साथ गाने गाए थे।@GI@

रतलाम। स्टेशन रोड पुलिस थाना पर पदस्थ महिला एसआइ 34 वर्षीय कविता सोलंकी की जहर पीने से मौत हो गई। उसके पास से माता-पिता के नाम लिखा सुसाइड नोट मिला है, जिसमें लिखा है कि उसकी शादी नहीं हो रही है, इससे वह डिप्रेशन में है। इस कारण जीना नहीं चाहती, इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं है। कविता सोलंकी मंदसौर जिले के सीतामऊ की रहने वाली है। वे वर्ष 2017 में पुलिस विभाग में एसआइ के पद पर भर्ती हुई थी।

 जिले के विभिन्न थानों में पदस्थ रहने के बाद वे 16 फरवरी 2020 से स्टेशन रोड थाने पर पदस्थ थी। 7 जुलाई की दोपहर करीब एक बजे कविता ने हाकिमवाड़ा रोड स्थित रंजित पुलिस लाइन में अपने सरकारी क्वार्टर में जहर पी लिया था। इसके बाद उसने थाने पर पदस्थ एक महिला पुलिसकर्मी को फोन कर बताया कि उसकी तबीयत खराब हो गई और उसे उल्टी हो रही है। थाने से कुछ कर्मचारी उनके घर पहुंचे और उन्हें शास्त्रीनगर स्थित निजी अस्पताल रतलाम हास्पिटल ले जाकर भर्ती कराया था।

 सूचना मिलने पर सीएसपी हेमंत चौहान, टीआई किशोर पाटनवाला व अन्य अधिकारी भी अस्पताल पहुंचे थे। उनका मरणासन कथन भी कराया गया था तथा उनके माता-पिता को सूचना दी गई थी। वे भी कुछ देर बाद अस्पताल पहुंच गए थे। गुरुवार सुबह कविता सोलंकी ने दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम के बाद शव उनके स्वजन को सौंप दिया गया। एसपी गोरव तिवारी ने मीडिया को बताया कि कविता द्वारा डिप्रेशन में आकर खुदकुशी करने संबंधी सुसाइड नोट मिला है, मामले की जांच की जा रही है।

नई दिल्ली। आगरा जेल में बंद नाबालिगों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। 14 से 22 वर्षों से आगरा जेल में बंद नाबालिगों को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दे दी है। अब आगरा जेल में लंबे समय से बंद इन आरोपियों की रिहाई प्रक्रिया शुरू हो गई है। पिछले सप्ताह जस्टिस इंदिरा बनर्जी की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर एक जवाब दाखिल करने के लिए कहा था।

बता दें कि आगरा की केंद्रीय जेल में पिछले 14 से 22 साल से बंद 13 कैदियों की रिहाई को लेकर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। याचिका में इन कैदियों की रिहाई की मांग की गई थी। घटना के वक्त सभी दोषियों को नाबालिग घोषित किया जा चुका है। इन दोषियों को खूंखार कैदियों के साथ रखा गया है।

नई दिल्ली। नये मंत्रियों के शपथ लेने के बाद अब उनके बीच विभागों के बंटवारा किया जा चुका है। देश के सबसे अहम मंत्रालयों में से एक रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी एक पूर्व आएएस अधिकारी को दी गई है। अश्विनी वैष्णव को रेल के अलावा आईटी और संचार मंत्रालय का कार्यभार भी सौंपा गया है। पूर्व नौकरशाह अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को मंत्री पद की शपथ ली थी। हम आपको बताते हैं कि आखिरकार कौन हैं देश के नये रेल मंत्री ?

अश्विनी वैष्णव को देश का नया रेल मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा वह आईटी मंत्री भी होंगे। रेल मंत्री का जि्म्मा अभी पीयूष गोयल के पास था, जिन्हें अब कपड़ा मंत्रालय दिया गया है। कपड़ा मंत्रालय संभाल रहीं स्मृति ईरानी को अब महिला एवं बाल विकास मंत्री बनाया गया है। शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा धर्मेंद्र प्रधान को दिया गया है तो अब हरदीप सिंह पुरी पेट्रोलियम मंत्री बनाए गए हैं। 

बता दें कि ओडिशा से भाजपा सांसद अश्विनी वैष्णव नौकरशाह रह चुके हैं। वहीं, अश्विनी वैष्णव 1994 बैच के आईएएस अधिकारी रहे हैं। अश्विनी वैष्णव ने आईएएस अधिकारी रहते हुए कई शानदार काम किए थे, जिसमें से एक ओडिशा के बालासोर में आए समुद्री तूफान के दौरान राहत पहुंचाना भी शामिल था। वो यहीं से चर्चा में आए थे। इसके बाद उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में पीएमओ में डिप्टी सेक्रेटरी बनाया गया था।

अश्विनी वैष्णव मूल रूप से राजस्थान के जोधपुर के रहने वाले हैं। साल 1994 बैच के आईएएस अधिकारी वैष्णव को सबसे पहले बालासोर का डीएम बनाया गया था। वह नवीन पटनायक के करीबी और पसंदीदा अधिकारियों में से एक थे। इसलिए जब वह सीएम बने तो उन्हें सबसे पहले ओडिशा के महत्वपूर्ण शहर कटक का कलेक्टर बनाया गया था। यहां उन्होंने कई बदलाव किए, जिसमें कानून-व्यवस्था दुरुस्त करना भी शामिल है।

नई दिल्ली। राष्ट्रपति भवन से 8 राज्यों में नए राज्यपाल की नियुक्ति का आदेश जारी हुआ है. इस आदेश के मुताबिक रमेश बैस को झारखंड का नया राज्यपाल बनाया गया है. फिलहाल वह त्रिपुरा के राज्यपाल का पद संभाल रहे थे. रमेश बैस का ताल्लुक छत्तीसगढ़ से है और वह सात बार सांसद रह चुके हैं. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में उन्हें त्रिपुरा का राज्यपाल बनाया गया था. 

झारखंड में रमेश बैस को राज्यपाल बनाए जाने के साथ ही राष्ट्रपति भवन से कुल 8 राज्यों में नए राज्यपाल की नियुक्ति की गई है. इनमें पीएएस श्रीधर को गोवा, सत्यदेव नारायण आर्य को त्रिपुरा, थावर चंद गहलोत को कर्नाटक, बंडारू दत्तात्रेय को हरियाणा का राज्यपाल नियुक्त किया गया है. ये सभी राज्यपाल इससे पहले भी अलग-अलग राज्यों में गवर्नर पद संभाल रहे थे. वहीं हरिबाबू कम्भपति और मंगूभाई छगनभाई पटेल और राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की पहली बार गवर्नर पद पर नियुक्ति हुई है. 

2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने छत्तीसगढ़ के सभी तत्कालीन सांसदों की टिकट काट दी थी. जिनमें रायपुर से सांसद रमेश बैस भी शामिल थे. इसे लेकर रमेश बैस के समर्थकों में भारी नाराजगी भी दिखी थी. हालांकि बाद में पार्टी ने उन्हें त्रिपुरा का राज्यपाल बना दिया था. रमेश बैस इन दिनों रायपुर आए हुए हैं. रविवार को उन्होंने पूर्व सीएम रमन सिंह से मुलाकात भी की थी.