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जिसे सब छुपाते है उसे हम छापते है



इन दिनों नगर निगम के निर्माण कार्यों के घपले , भौतिक रूप से सबके सामने दिखाई देने लगे हैं. दुर्ग शहर के कांग्रेसी विधायक अरुण वोरा व दुर्ग नगर निगम के सभापति के द्वारा अनेक बार निगम के सिविल कार्यों की गुणवत्ता संबंधित शिकायतें की गईं परंतु महापौर और महापौर परिषद ने इसे राजनैतिक दुष्प्रचार  ठहरा कर कभी भी उन मामलों की जांच कराने की ज़हमत नहीं उठायी। कुछ मामलों की शिकायतें जिला प्रशासन के सामने लोगों ने उठाईं , जिनपर जिलाधीश के निर्देशों पर जांच की गई और मामलों की लीपा पोती कर उनके सही होने की रिपोर्ट पेश कर दी गईं। अब वैसे अनेक निर्माणों की खराब क्वालिटी चीख चीख कर अपने दर्शन करा रही है। पूरब टाइम्स ने पूर्व में दुर्ग निगम द्वारा बनाये जा रहे जलगृह कॉम्प्लेक्स की साथ किश्तों में कच्चे चि_ों से उच्च प्रशासन व आम नागरिकों को अवगत कराने की कोशिश की है। पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट...
पूरब टाइम्स, दुर्ग। दुर्ग के इंजीनियर पहले शौचालय निर्माण जैसे छोटे मोटे मामले में अनियमितता के आरोपों में फंसते थे लेकिन अब आम जनता के जान-माल से जुड़ी , करोड़ों रुपयों से बनी पब्लिक बिल्डिंग में कोताही दिखाते हुए नजऱ आते हैं तो बेहद आश्चर्य होता है। विदित हो कि इन कार्यों को अन्य निगमों की तुलना में अच्छे रेट्स में भी ठेकेदारों को दिया गया परंतु फिर भी नाप व बिल में धांधली करना या तो निगम के इंजीनियरों की आदत बन गया है या फिर किन्हीं रसूखदारों के दबाव में ऐसे कारनामें किये जाते हैं। दुर्ग का मंडी कॉम्प्लेक्स एक बार डिफाल्ट होकर पुन: शुरू किया गया। उसके स्ट्रक्चर के बारे में भी सवाल उठने लगे थे , ऐसे में अतिरिक्त सावधानी बरतने की जगह उस पर तकनीकि अपराध करना समझ के परे है। इस मामले से जुड़े कागज़ों के आधार पर बनाई जा रही इन खबरों पर उच्च प्रशासन कब तक कार्यवाही करेगा यह तो वक़्त बताएगा परंतु जांच होना अवश्यंभावी है। 

सूचना के अधिकार में प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार जो वर्क ओर्डर दिया गया था क्रमांक/ लो.क. वि./ 2016/51 जिसका दि. 12/07/2016 था। इसे अवर सचिव , नगरीय प्रशासन विभाग छ.ग. शासन के स्वीकृति पत्र क्र. 3712/212/16/18 दि. 20 मई 2016 के अनुसार दिया गया था। इस कार्य की अनुमानित लागत रु.256.79 लाख (दो करोड़ छप्पन लाख उन्यासी हज़ार रु. ) थी। इसे एस.ओ.आर (तयशुदा सरकारी रेट का शेड्युल ) दि. 01.11.1999 के अनुसार 21.89प्रतिशत अधिक दर पर स्वीकृत किया गया था। जब इसका पेमेंट किया गया तो सन् 2009 के एसओआर के आधार पर किया गया। यह कार्य इंजीनियरों के द्वारा जानबूझकर किया गया या त्रुटि थी तो देखने वाली बात यह भी है कि इस काम के ऊपर दुर्ग निगम के  ऑडिटर पोद्दार एंड कंपनी ने क्यों ऑब्जेक्शन नहीं लगाया? 

एस्टीमेट में एसओआर के अनुसार भूतल के सिविल कार्य का खर्च 68.54 लाख तथा वाटर सप्लाई , इलेक्ट्रिकल इत्यादि का 10.28 लाख था. इसी तरह प्रथम तल के सिविल कार्य का खर्च 73.46 लाख व वाटर सप्लाई , इलेक्ट्रिकल इत्यादि का 13.22 लाख था। द्वितीय तल में सिविल कार्य का खर्च 69.98 लाख था व वाटर सप्लाई , इलेक्ट्रिकल इत्यादि का 12.59 लाख था। इस तरह से सिविल का कुल कार्य 68.54+ 73.46  + 69.98 = 211.98 था तथा अन्य कार्य का 36.03 लाख होता था.  केवल सिविल कार्य पर यदि टेंडर के अनुसार 21. 89 प्रतिशत बढ़ा दें तो लगभग 258.40 लाख का सिविल कार्य होना था। यदि हम बिल भुगतान दिनांक 13/ 08/2018 देखें तो केवल सिविल कार्य में लगभग 315.54 लाख रुपये का हो गया है। अब देखने वाली बात यह है कि सूचना के अधिकार से प्राप्त कागज़ों के आधार पर किसी भी नोटशीट पर इसका कोई उल्लेख नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि ऐसी मनमानी का सहयोग व अनदेखी करने वालों पर कार्यवाही होती है या नहीं।

भिलाई।  अमलेश्वर के महादेव घाट पर  एक अजीब घटना हुई। एक 16 वर्षीय किशोरी अपने बॉयफ्रेंड के साथ महादेव घाट के किनारे बैठी थी। किशोरी के कुछ दोस्तों ने पुलिस और उसके परिजनों को जानकारी दी कि वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ भागने की तैयारी में है और अभी महादेव घाट के पास है। इस पर किशोरी के परिजन पुलिस के साथ पहुंची। परिजनों और पुलिस को देखते ही किशोरी ने नदी में छलांग लगा दी। पुलिस के जवानों ने उसे बाहर निकाला और रात में उसे सखी सेंटर में रखवाया। वहीं परिजनों की शिकायत पर किशोरी के प्रेमी के खिलाफ अपहरण की धारा के तहत अपराध दर्ज किया है। जानकारी के मुताबिक उक्त घटना बुधवार की शाम करीब सात बजे की है। अमलेश्वर निवासी आरोपित दीपक यादव 25 का गांव की ही एक 16 वर्षीय किशोरी के साथ प्रेम संबंध था। नदी से निकालने के बाद पुलिस दोनों को लेकर थाने पहुंची। जहां किशोरी ने अपने माता-पिता पर ही मारपीट का आरोप लगा दिया। उसने अपने परिजनों के साथ घर जाने से इनकार कर दिया। इस पर पुलिस ने उसे रात में सखी सेंटर में रखवाया। वहीं परिजनों की शिकायत पर आरोपित दीपक यादव के खिलाफ अपहरण की धारा के तहत अपराध दर्ज किया है।
सखी सेंटर में दुष्कर्म की भी पुष्टि किशोरी ने रात में अपने साथ दुष्कर्म न होने की बात कही, लेकिन सखी सेंटर पहुंचने के बाद उसने अपने बयान में बताया कि उसका आरोपित दीपक यादव से शारीरिक संबंध है। इस आधार पर अब पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। डॉक्टरी जांच के बाद किशोरी के बॉयफ्रेंड के खिलाफ और भी धाराएं जोड़ी जाएंगी। वर्सन  भागने के चक्कर में गिरी थी किशोरी खुद नदी में नहीं कूदी थी बल्कि भागने के चक्कर में उसका पैर फिसल गया था। रात में उसने परिजनों के साथ जाने से इनकार कर दिया था। इसलिए सखी सेंटर में रखवाया गया था। वहां हुए बयान के आधार पर अब आगे की कार्रवाई की जाएगी।

पूरब टाइम्स, रायपुर, दुर्ग . भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सन् 2018 में सर्कुलर निकाल कर स्कूली बच्चों के बस्ते का वजऩ तय कर दिया था. इस सर्कुलर नं 65/18/2017 ईडीएन(एडब्ल्यू) /1230 दिनांक 20.11.2018 के अनुसार क्लास 1-2 में 1.5 किलो तक व क्लास 10 में अधिकतम 5 किलो तक बस्ते का वजऩ हो सकता है. व्यथा का विषय यह है कि बच्चों के स्कूली बैग का वजन, किस कक्षा में कितने तक होना चाहिए और इसके लिए बनाये गए नियम कानून क्या है ? इसकी जानकारी जिला शिक्षा अधिकारी सार्वजनिक नहीं कर रहे थे . पूरब टाइम्स की खबरों के बाद , अब समाजसेवी संस्थाओं व पालकों के द्वारा प्रशनांकित करने के बाद , हर स्कूल की हर क्लास में प्रचलित किताबों की सच्ची जानकारी लेकर , हर क्लास के बस्ते , को भौतिक रूप से सत्यापित करने की जगह , सीधे पालकों को वेब साइट के अनुसार बस्ते का वजन जांचने के लिये , जिला शिक्षा अधिकारी का पत्र समझ के बाहर है . पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट ..

दुर्ग जिले के स्कूलों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को भारी भरकम वजन ढोने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है . इस मामले में पालक अपना पक्ष सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं . जिसका कारण यह है कि जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के अधिकारियों ने स्कूल बैग के वजन को नियमानुसार करने के लिए कोई व्यवहारिक कार्यवाही नहीं की है.  इस मामले को लेकर पालक और समाज सेवी जिला मुख्यालय क्षेत्र के विधायक के समक्ष भी अपनी व्यथा प्रस्तुत कर चुके है . उल्लेखनीय है कि विधायक अरुण वोरा ने बकायदा पत्र लिखकर दुर्ग डी. ई.ओ को पालकों की व्यथा से अवगत कराया है लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई . सूत्रों के अनुसार जब दुर्ग डी. ई.ओ ने विधायक के पत्र को महत्व नहीं दिया तो विधायक अरुण वोरा ने पालकों की शिकायत को अपने निजी पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री को अवगत कराया है.  अब आने वाला समय बताएगा कि मुख्य मंत्री कार्यालय इस गंभीर मामले में क्या प्रतिक्रिया करेगा ? 

स्कूल बैग मामले में फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं ने जिला शिक्षा अधिकरी के पत्र पर प्रतिक्रिया करके उनको प्रश्ना अंकित कर दिया है और अभिलीखीत किया है कि पालको और बच्चों को उनके अधिकारों से वंचित करने वाली विषम परिस्थिति उत्पन्न करके जिला शिक्षा अधिकारी दुर्ग ने स्कूली बच्चों के अधिकार पर अतिक्रमण कर दिया है और विधि निर्देश का सुनियोजित अवमान करके अपने पदेन प्राधिकार का दुरुपयोग करने वाले कर्याचरण का उदाहरण स्थापित किया है  . जिससे पालक व्यथित हैं . 

पालको ने पुस्तकों कि सूची के साथ वांछित जानकारी को स्पष्ट कर कहा है कि कृपया पहली से बारहवीं तक की कक्षाओं की पुस्तकों के नाम, प्रकाशकों के नाम व पुस्तकों का वजन की जानकारी कक्षावार प्रदान करने की कृपा करें जिससे कि स्कूल बैग के अंदर के पुस्तकों का वजन स्पष्ट हो सके और पालक अपने स्तर पर अपने बच्चे का स्कूल बैग का वजन करके यह निष्कर्ष निकाल सकेंगे कि पुस्तकों का, कॉपी का और स्कूल बैग का वजन कितना है ? आप कक्षावार विधि मान्य पाठ्यक्रमानुसार पुस्तकों का नाम, प्रकाशकों का नाम और पुस्तकों का वजन की सूची, कक्षावार प्रदान करेंगे और आपके संदर्भित पत्र से उत्पन्न विषम परिस्थिति से छात्रों और पालकों को निजात दिलाएंगे तथा इस विषय पर अपने पदेन कर्तव्य का निर्वहन करके उक्त विषम परिस्थिति का सार्थक निदान करेंगे इस प्रकार की लिखित प्रतिक्रिया अंजुमन फाउंडेशन ने की है . 

पूरब टाइम्स, भिलाई। निगम के के क्षेत्र में पिछले वर्ष पूर्व जगह- जगह पर बस स्टॉपेज बनाये गये थे जो कि अनुपयोगी साबित हो रहे हैं, बिना सोच- विचार किए ही निगम प्रशासन के द्वारा दनादन क्षेत्र में अनेक अमानक बस स्टॉपेज बनवा दिए हैं जोकि किसी उपयोग में नहीं आ रहे हैं, यहां पर बसें रूकती ही नहीं है और न ही सवारी वाहन ठहरते हैं। सबसे प्रमुख समस्या यह है कि आम जनता भी इसका कोई इस्तेमाल नहीं कर रही है। जिस वजह से यह बेकार और कंडम हो गये . पीपीपीके तहत इसे किसने बनाया , क्यों बनाया और किसने अप्रूव किया इस बात को बताने से निगम के अधिकारी बुचक रहे हैं . आम जनता के द्वारा कोई इस्तेमाल न करने और पीपीपी वाली कंपनी की निगरानी के अभाव में सार्वजनिक संपत्ति केवल दिखावा बनकर रह गई है। पता नहीं क्यों बिना सिटी बस के तय रुकने की जगह को ध्यान में रखे बिना बस स्टॉपेज बनाने में हड़बड़ी दिखाई गई और अब उस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है ? अब इस मामले को नगर निगम के कमिश्नर  व दुर्ग जिले के जिलाधीश संज्ञान लेकर , फाइलों की जांच कर दोषियों पर कार्यवाही करेंगे 
अब इनका सभी इस्तेमाल नशेड़ी एवं छेड़छाड़ करने वाले असामाजिक तत्व कर रहे हैं। निगम ने जो स्टॉपेज बनाकर दिया है मानो इनको मुंहमांगी मुराद मिल गई हो। यहां पर कोई रोकने- टोकने वाला रहता नहीं है, ये लोग मजे से अपना अड्डा जमा लेते हैं और फिर वहां ताश, सट्टा खेला जाता है। इसके अलावा गांजा, शराब इत्यादि नशे का जमकर सेवन करके मूर्छित अवस्था में यही सो जाते हैं। इनको रहने- सोने की फिक्र ही नहीं करनी पड़ती है , सब कुछ नि: शुल्क आसानीसे उपलब्ध हो जाता है। इसके साथ ही मार्गों में आवागमन करने वाली महिलाओं एवं युवतियों के साथ छेड़छाड़ करनेका स्थायी निवास बन गया है। इन स्टॉपेज को बनाने से पूर्व प्रशासन को पूरी तैयारी कर लेनी थी ताकि आमजनता कोसुविधा का लाभ मिल सके। अब देखना यह है कि प्रशासन इसकी सुध कब लेता है या फिर इसे यूं ही छोड़ दिया जाता है ताकि आगे फिर संधारण के नाम पर मलाई खाई जा सके।

पूरब टाइम्स, दुर्ग भिलाई . लगता है कि जिला शिक्षा विभाग अविधिक तरीक़े  से स्कूल चलाने वालों पर कार्यवाही नहीं बल्कि उन्हें केवल नोटिस देने के लिये बनाया गया है. जब अविधिक कार्यशैली वाले स्कूल , उस नोटिस का जवाब देते हैं ( अनेक मामलों में नहीं भी देते) तब उस जवाब को मान्य कर , नस्तीबद्ध कर दिया जाता है. छ.ग. में पिछले 15 सालों के भाजपा के शासन काल सब कुछ इसी प्रकार से चलता आया है . संचालक या मंत्रालय से भी जांच के निर्देश आने पर , उनकी रिपोर्ट में भी लीपा पोती कर , स्कूलों पर विधि विहित अपराधिक प्रकरण दजऱ् करने की जगह वार्निंग या न्यूनतम दंड लगाकर छोड़ दिया जाता था . पिछले सालों की रिपोर्ट में , अमानक ढंग से लाभ कमाने वाली स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाई गई थीं , उनपर कड़ी कार्यवाही नहीं की गई . इस बार कांग्रेस की सरकार आई है और उसने भी इस मामले में कड़ी नजऱ रखने के निर्देश दिया हैं  पर पुरानी जांच के कागज़ सारवजानिक नहीं किये गये यानि कि दबा दिये गये . निजि स्कूलों के संचालकों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे अगले सत्र में फिर से फीस बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं. पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट ..

छ.ग. शासन के पत्र क्र. 2887 /आर-133 / 2016/20-03 के अनुसार जिला शिक्षा अधिकारी को देखना चाहिये कि विद्यालय द्वारा प्रस्तावित शुल्क युक्तियुक्त हैं व यह न लाभ न हानि के सिद्धांत पर आधारित रहें. उसे यथार्थ परीक्षण कर ही शुल्क वृद्धि की स्थित में अधिसूचित करने की कार्यवाही होनी थी . इस मामले में वर्ष 2017- 2018 में इनक्वायरी हुई थी व अनेक विद्यालयों में पैसा सरप्लस मिला था जिसके कारण से वर्ष 2018-2019 में फीस बढ़ाने पर रोक लगा दी थी . उसे नजऱ अन्दाज़ किया गया पिछले वर्ष लगभग सभी नामी स्कूलों ने , बिना पूर्वानुमति के 6 से 10 प्रतिशत फीस बढ़ाई थी व जिनका स्पष्टीकरण जिला शिक्षा अधिकारी ने मान्य कर दिया था . जिनमें से प्रमुख थे-डीपीएस भिलाई , डीपीएस दुर्ग , केपीएस , माइल स्टोन स्कूल, शारदा स्कूल, शंकराचार्य हुडको, डीएवी हुडको, मैत्री विद्या निकेतन, शंकरा विद्यालय सेक्ट. 6 , इंदु आईटी इत्यादि . ऐसे ही अनेक स्कूल इस बार भी , कागज़ों मे हानि दिखाकर फिर फीस बढ़ाने की ताक में हैं . इनके पुराने कागज़ों की पुनर्जांच आवश्यक है .

मंत्रालय के स्कूल शिक्षा विभाग ने अपने पत्र कर. 74/ 2717/2018/20-तीन दिनांक 09.01.2019 में भिलाई स्थित निजी विद्यालयों में , बिना अनुमोदन के फीस वृद्धि की जांच के आदेश दिये थे. एक समाजसेवी की शिकायत के आधार पर जांच की गई थी . जिसमें जांच दल के प्रतिवेदन के अनुसार विद्यालयों में सरप्लस राशि पाये जाने का उल्लेख हुआ था व विद्यालयों को भविष्य में सरप्लस की स्थिति में विद्यालयीन शुल्क में वृद्धि न करने कहा था. वे विद्यालय थे - कृष्णा पब्लिक स्कूल नेहरू नगर , भिलाई , शंकराचार्य विद्यालय हुडको , शंकरा विद्यालय सेक्टर 10 भिलाई . विदित हो कि ये तीनों स्कूल , केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल से संबद्धता रखते है , जिसके नियमों के कारण किसी भी वक़्त , स्कूल संचालकों की गलती , केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल से संबद्धता समाप्त करा सकता है और हज़ारों बच्चों का भविष्य अंधकार में जा सकता है . अन्य मामलों में भी सीएजी रिपोर्ट को मद्दे नजऱ रखते हुए राज्य शासन ने जिला शिक्षा अधिकारी से परीक्षण व अभिमत देने का निर्देश दिया था .


नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW), जिसे शहरी ठोस अपशिष्ट भी कहा जाता है, एक अपशिष्ट प्रकार है जिसमें मुख्य रूप से घर का कचरा (घरेलू अपशिष्ट) और कभी-कभी वाणिज्यिक अपशिष्ट भी शामिल होता है जिसे एक दिए गए क्षेत्र से नगरपालिका एकत्रित करती है यह कचरा या तो ठोस रूप में होते हैं या अर्ध-ठोस रूप में होता है आम तौर पर इसमें औद्योगिक घातक अपशिष्ट शामिल नहीं होता अवशिष्ट कचरा शब्द, घरेलू स्रोतों से बचा हुआ कचरा है जिसमें ऐसी सामग्री शामिल है जिसे अलग नहीं किया गया है या पुनप्र्रसंस्करण के लिए नहीं भेजा गया है इस कचरे में प्राकृतिक तरीके से सडऩशील कचरा, भोजन और रसोई का कचरा, हरित कचरा, होता है इसमें बडी मात्रा में पुनर्नवीनीकरण योग्य सामग्री: कागज, कांच, बोतल, डब्बे, धातु, कुछ ख़ास प्लास्टिक आदि भी सम्मलित होता है इसमें अक्रिय कचरा जैसे निर्माण और विध्वंस कचरे, गंदगी, पत्थर, मलबा. मिश्रित अपशिष्ट: बेकार कपड़े, टेट्रा पैक, बेकार प्लास्टिक जैसे खिलौने भी सम्मिलित होता है उललेखनीय है कि इसमें घरेलू खतरनाक अपशिष्ट और विषाक्त अपशिष्ट: जैसे दवाएं, ई-कचरा, पेंट, रसायन, प्रकाश बल्ब, फ्लोरोसेंट ट्यूब, स्प्रे कैन, उर्वरक और कीटनाशक कंटेनर, बैटरी, जूता पॉलिश. का मिश्रण होता है जब यह आलग- अलग प्रकार का कचरा मिल जाता है और इसमें रासायनिक क्रियाएं होती है तो पर्यावरण और लोक स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक हो जाता है।

केंद्रीय पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय छत्तीसगढ़ राज्य के लोक स्वास्थ्य को संरक्षित करने में विफल नजर आता है इस विषय पर कार्य कर रहे विषय विषेशज्ञों से चर्चा करने पर यह स्पष्ट हुआ है कि छत्तीसगढ़ राज्य से निर्वाचित भजपा सांसद अपने क्षेत्र के नगरीय निकायों के द्वारा नियमानुसार प्रतिवर्ष भेजे जाने वाले विवरण और वार्षिक प्रतिवेदन का संज्ञान नहीं लेते हैं जिसका फायदा लेकर स्थानीय नगरी निकाय के अधिकारी अपनी कार्यवाही प्रक्रिया की गलतियों को छिपाने के लिए मनगढ़ंत व्यौरा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्रीय अधिकारी कार्यालय को भेजते हैं इसी गैर व्यवहारिक आंकड़ों के आधार पर केंद्रीय पर्यावरण संरक्षण मंडल अपना निर्णय लेकर कार्यवाही करता है क्योंकि नगरी निकाय द्वारा भेजा गया विवरण मनगढ़ंत होता है और उसके आधार पर राज्य और केंद्र का वार्षिक प्रतिवेदन तैयार किया जाता है इस कारण अनियमितताओ को कागजी खानपूर्ति में छिपा लेने का तथाकथित अपराध करने में निगम आयुक्त सफल हो जाते है उल्लेखनीय है कि जब काल्पनिक आंकड़ों के आधार पर आधारित वार्षिक प्रतिवेदन पर ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे निर्णायक भूमिका निभाने वाले न्यायालयीन घटक भी अपनी जिम्मेदारी निभाने तो निश्चित तौर पर इस तरह कारवाही शंकसपद ही रहेगी और लोक स्वास्थ्य संरक्षण उद्देश्य हासिल करने में प्रशासनिक तंत्र विफल ही रहेंगे गौरतलब रहे की यदि सांसद अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाएंगे और पदेन कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे तो छत्तीसगढ़ राज्य के लोकस्वास्थ्य को बचाने की दिशा में कार्यवाही होगी और भाजपा के प्रति जनता में पहले वाला विश्वास जागेगा।

बारिश का महिना अब  खत्म हो गया पर सड़कों से मवेशियों को हटाने में निगम नाकाम रहा। पिछले चार महिनों से निगम मवेशियों को सड़क के हटाने की बात करता रहा है लेकिन फिर जमीनी हकीकत यही रही कि निगम ने सिर्फ वाहवाही बटोरने की कोशिश की। ज्ञातव्य है कि नगर निगम दुर्ग व भिलाई हर साल आवारा पशुओं को पकडऩे में लाखों रुपये खर्च करते  इसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखाई देता है . ये मवेशी यातायात बाधित कर लोगों के लिए खतरनाक हो गए हैं। व्यस्ततम मार्ग पर इनकी वजह से जाम की स्थिति बनती है।  यदि आप किसी काम से दुर्ग पुलगांव होते हुए अंडा क्षेत्र की ओर जा रहे हो या फिर दुर्ग से नेहरू नगर होते हुए रायपुर की तरफ  जा रहे हैं तो वाहन की रफ्तार पर नियंत्रण रखने के साथ ही सचेत रहें। आपकी जरा सी असावधानी आपको अस्पताल तक पहुंचा सकती है। अन्य मार्गों की बात तो छोडिय़े, आप नेशनल हाइवे पर सरेआम आवारा मवेशियों का डेरा देख सकते हैं । 
पूरब टाइम्स संवाददाता, दुर्ग/भिलाई । वाहन चालक इनके आगे पीछे से गुजरने की मशक्कत में लगे हैं। ऐसा नजारा शहर की हर सड़क पर देखने को मिल रहा है। मवेशियों को पालने वाले इन्हें सड़क पर खुला छोड़ रहे हैं वहीं इन्हें हटाने में नगर निगम की भी दिलचस्पी नहीं। झिर झिर बारिश और रात के समय तो हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं। इन सभी सड़कों से उच्चाधिकारी भी गुजऱते हैं पर पता नहीं क्यों संज्ञान लेकर जि़म्मेदार लोगों को कड़ाई से निर्देश नहीं देते हैं . क्या किसी बड़े हादसे का इंतज़ार है या नजऱ अन्दाज़ करना उनकी मजबूरी बन गया है . जो भी हो आम जनता बहुत परेशान है। 

आवारा मवेशियों के कारण शहर में आए दिन हो रही दुर्घटनाओं के कारण शहरवासियों के साथ जनप्रतिनिधि भी परेशान है आखिर उन्हें सड़क पर ही चलना है । सभी चाहते हैं कि शहर की सड़कों पर मवेशी नजर नहीं आए, लेकिन मवेशी क्यों नहीं हटते, शहर में तबेले चलाने वालों के खिलाफ  ं नहीं कारवाई हो पाती है? यह सवाल सबके जहन में है। आवारा मवेशियों के कारण जिस तरह से दुर्घटनाएं हो रही हैं, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। निगम को प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए। इस मामले में पूरा शहर चिंतित है। मवेशी मालिकों को चिन्हीत कर जुर्माना की राशि बढ़ानी चाहिए, कोई वाजिब वजह हो तो समाधान करना चाहिए साथ ही निगम को स्वयं भी जल्द से जल्द कांजी हाउस में मवेशियों को पहुंचाना चाहिए।


मवेशियों के कारण शहर के हर क्षेत्र में रहने वाले नागरिक परेशान है। पूरे शहर में स्टेशन रोड अग्रसेन चौक, चंडी मंदिर गया नगर, स्मृति नगर, पावर हाऊस जीई रोड, दुर्ग इंदिरा मार्केट, नेहरू नगर, सेक्टर एरिया, रिसाली अमूमन हर जगह पर आवारा मवेशियों को जमावड़ा रहता है। दिन में स्थिति रात की अपेक्षा कम खतरनाक होती है लेकिन रात में होने वाले हादसो के लिए मवेशी मुख्य वजह बन चुके हैं।

भिलाई। पावर हाउस रेलवे स्टेशन के पहले रम्बल स्ट्रिप बनाए जाएंगे। यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए छावनी सीएसपी ने एनएच के अधिकारियों से इस संबंध में चर्चा की है। जिसपर एनएच के भी अधिकारियों ने हामी भरते हुए पावर हाउस स्टेशन के पास रम्बल स्ट्रिप बनवाने की बात कही है। ताकी स्टेशन के पहले वाहनों की रफ्तार कम हो जाए और यात्रियों को किसी भी प्रकार का खतरा न हो बता दें कि दुर्ग रेलवे स्टेशन के बाद पावर हाउस स्टेशन से सबसे अधिक यात्री रेल यात्रा करते हैं। वर्तमान में फोरलेन पर फ्लाई ओवर निर्माण के चलते पावर हाउस चौक से लेकर रेलवे स्टेशन के आगे तक सड़क को घेर लिया गया है। फोरलेन का पूरा ट्रैफिक सर्विस लेन पर चल रहा है। इससे पावर हाउस स्टेशन आने-जाने वाले यात्रियों को खासी दिक्कत हो रही है। जल्दी निकलने की होड़ में वाहनों की रफ्तार कम नहीं हो रही है। इससे यात्रियों की जान को भी खतरा है। इसे देखते हुए छावनी सीएसपी ने एनएच के अधिकारियों से चर्चा की है और पावर हाउस रेलवे स्टेशन के गेट के पहले रम्बल स्ट्रिप बनवाने के बारे में बात की है। 

कुछ दिन पहले कुम्हारी चौक पर एक हादसा हुआ था। जिसमें एक बच्ची की मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद वहां के लोगों ने आंदोलन कर दिया था और चौक पर रम्बल स्ट्रिप बनवाने की मांग की थी। इसके बाद एनएच ने वहां पर रम्बल स्ट्रिप बनवाया। पावर हाउस चौक पर रोड को घेरने के बाद अभी यहां पर भी वैसी ही स्थिति बन रही है। लिहाजा हादसों की आशंका को देखते हुए पुलिस ने पहले ही वहां पर रम्बल स्ट्रिप बनवाने के लिए प्रयास किया है।

भिलाई।  पीएचक्यू रायपुर में पदस्थ भिलाई निवासी सब इंस्पेक्टर की बेटी ने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। सुबह जब युवती कमरे से बाहर नहीं आई तो पिता ने दोस्तों की मदद से दरवाजा तोड़ा और अंदर गए। पुलिस को युवती के पास से एक सुसाइड नोट मिला है। जिसमें उसने अपनी मर्जी से आत्महत्या करने का जिक्र किया है। युवती के बचपन के एक दोस्त ने सप्ताहभर पहले खुदकुशी कर ली थी। इसके बाद से वह चिंतित रहने लगी थी। गुरुवार को बेटी के रिश्ते के लिए एक परिवार आया था। सुसाइड नोट में लिखा मां और भाई का ख्याल रखना पापा सब लोग बहुत अच्छे हैं छात्रा के पिता ने बताया कि सुसाइड नोट में उसने लिखा कि पापा मां और छोटे भाई का ध्यान रखना। मां की काम में मदद के लिए बाई लगा लेना। मां की उम्र हो गई है। इस वजह से वह काम नहीं कर पाती है। मां पर ज्यादा नाराज मत होना। घर का काम नहीं कर पाने की वजह से उसे डांट सुनना पड़ता था। आप लोगों के लिए मैं कुछ नहीं कर पाई। सब लोग बहुत अच्छे हैं। पुलिस के मुताबिक करीब आधे पेज का सुसाइडल नोट मिला है। उसे पढ़ने पर पता चला है कि युवती ने कोई भी संदेहास्पद बातें नहीं लिखी है। 
भिलाई नगर टीआई राजेश बांगडे ने बताया कि गुरुवार को युवती की शादी के लिए लड़के वाले देखने आए थे। दोनों बेटी और पिता को रिश्ता मंजूर नहीं था। रिश्ते वालों के जाने के बाद सभी ने एक साथ खाना खाया और अपने कमरे में सोने चले गए थे। देर रात बेटी ने सुसाइड कर ली। पिता ने बताया कि पहले उनकी पोस्टिंग पहले जगदलपुर में थी। यहां बेटी के बचपन के दोस्त ने सप्ताहभर पहले आत्महत्या कर ली थी। इस हादसे की सूचना मिलने के बाद से बेटी गुमसुम रहने लगी थी। 

पूरब टाइम्स भिलाई।  रोटरी क्लब इंटरनेशनल के डिस्ट्रिक्ट 3261 में भिलाई में एक नया क्लब स्थापित किया गया, जिसको नाम दिया गया रोटरी क्लब पिनाकल इस क्लब की खासियत यह रही कि इसमें पूरी 90 सदस्य महिलायें हैं, इस क्लब की नव पदस्थ अध्यक्षा विशाखा रस्तोगी ने बताया कि स्थापना व शपथ विधि समारोह के लिये मुख्य अतिथि के रूप में रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3261 के वर्तमान गवर्नर रो. रंजीत सिंह सैनी थे व उनके साथ इस डिक्ट्रिक्ट की प्रथम महिला रो. रज्जो सिंह सैनी ने भी अपनी उपस्थिति दी . क्लब के भूतपूर्व गवर्नर रो. हरजीत सिंह हुड्डा व रो. संजीव राठी विशिष अतिथि थे। 



 पिछले दिनों होटेल अमित इंटरनेशनल में रोटरी कलब पिनाकल का स्थापना व शपथ का कार्यक्रम हुआ जिसमें भारी संख्या में महिलाओं व अंचल के अन्य रोटरी क्लब के सदस्य उपस्थित थे।  एक भव्य कार्यक्रम में भिलाई की महिलाओं ने बड़ी संख्या में रोटरी क्लब इंटरनेशनल से जुड़कर सेवा का संकल्प लिया  महिलाओं के जोश व खरोश से भरे इस कार्यक्रम में जब विशाखा रस्तोगी को उनकी टीम के साथ रोटरी पिन पहनाया गया तो पूरे हॉल के लोग पांच मिनट तक खड़े होकर उनका तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सम्मान करते रहे  पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरजीत हुड्डा व संजीव राठी ने इन महिलाओं की टीम के द्वारा बनाई गयी भविष्य की कार्ययोजना के लिये उन्हें शुभकामनाएं दीं वहीं गवर्नर रंजीत सिंह सैनी ने इन महिलाओं के द्वारा इस पहल को शानदार बताया  इस क्लब के एडवाइसर , असिस्टेंट गवर्नर रो. शशांक रस्तोगी के मार्गदर्शन में इतनी बड़ी संख्या बल वाले क्लब की स्थापना अपने आप में एक बड़ी बात रही . रोटरी क्लब पिनाकल की अध्यक्षा ने अपनी टीम की घोषणा की जिसमें सचिव ट्विंकल गोयल , कोषाध्यक्ष भावना गोलछा , कार्यकारणी सदस्य चारुथा जोशी व तान्या अग्रवाल रहे . अगले साल के लिये प्रेसीडेंट पद के लिये अनुभा जैन नामित की गईं . इस क्लब के बड़ी संख्या के सदस्यों के अलावा रोटरी भिलाई ग्रेटर के सदस्य राजेश जैन, दिलीप गोलछा, मलय जैन, सुमित अग्रवाल, मधुर चितलांग्या , गौरव ढांढ , प्रशांत बंसल, भरत लखोटिया , श्रीकांत अग्रवाल, यश जैन, मनोज जैन, दीप गोयल, नितिन सूपे, नीलाद्री साहा, जनेश्वर सिंह , मधुर अग्रवाल , नवीन अग्रवाल  इत्यादि व बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे 

पूरब टाइम्स दुर्ग।  दुर्ग की ट्रैफिक व्यवस्था त्यौहार के सीज़न में पूरी तरह से भच्च हो जाती है, दुर्ग का नगर निगम, व्यस्ततम मार्केट क्षेत्रों में ना तो प्रॉपर पार्किंग की व्यवस्था मुहैया कराने में सफल हुआ है और ना ही अपनी पार्किंग क्षेत्र को बेहतर बनाने की योजना को अमलीजामा पहना पाया है, जब से रोड डिवाइडर बने हैं इन्दिरा मार्केट से स्टेशन रोड तो पूरे साल भर जाम की स्थिति से रूबरू होता है, अब हालात शहर के अन्य क्षेत्रों में बद से बदतर होती झा रही हैं, केवल ट्रैफिक पुलिस पर ज़िम्मेदारी देकर इस ट्रैफिक जाम की समस्या से निजात नहीं पाया जा सकता है, इस कार्य के लिये शहरी सरकार और जिला प्रशासन को एक्शन लेना बहुत ज़रूरी है, कुछ स्माजसेवी संस्थाओं ने भी इस समस्या के निराकरण में सहयोग देने की पहल की है, यह एक सराहनीय कदम है, 



दुर्ग शहर का मुख्य बाजार इंदिरा मार्केट कई विषयों पर विवादित है . इस मार्केट के पार्किंग स्थल को संरक्षित करने के लिए निगम विफल नजर आता है, इंदिरा मार्केट में अतिक्रमण मुक्त सड़क नगर निगम द्वारा नहीं दिए जाने की शिकायत स्थानीय स्तर पर की जाती रही है लेकिन निगम अधिकारी कार्यवाही नहीं करते हैं,  जिसके कारण अधिकांश पार्किंग स्थल और सड़क का भाग व्यवसायियों के कब्जे में आ गया है. स्थानीय लोग इससे
बहुत परेशान है, व्यवसाई भी कई कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं , उल्लेखनीय है कि दुर्ग निगम प्रशासन ने इंदिरामार्केट व इसके आस पास के इलाकों का नक्शा व अन्य आधारभूत सुविधाओं का विवरण सर्व साधारण के लिए सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसके कारण अनियमित भूखंड और अतिक्रमणकारियों को संरक्षण मिल गया है, इंदिरामार्केट का पार्किंग स्थल वर्तमान में सिर्फ एक स्थान पर दिखाई देता है लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर इस विषय का गहन अध्यन किया जाय तो कई अवैध कब्जे स्पष्ट हो जाएंगे  और यदि निगम प्रशासन ईमानदारी से अपना कर्तव्य निर्वहन करेगा तो रायपुर रेलवे स्टेशन के समान इन्दिरा मार्केट परिसर भी आम जनता के लिए सुरक्षित और सुलभ पहुंच में हो जाएगा।




राजेंद्र पार्क चौक से गुजरने के लिए आम जनता को बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि यहां की ट्रैफिक व्यवस्था व्यवसायिक गतिविधियों के कारण बाधित हो गई है, सूत्रों के अनुसार राजेंद्र पार्क चौक के सामने पार्किंग स्थल पर प्रशासन ने व्यावसायिक उपयोग के लिए कुछ लोगों को दुकानों के लिए अस्थाई अनुमति दिए जाने की बताई जा रहीं हैं, पार्किंग के लिए सुरक्षित स्थान को व्यवस्थित करने के लिए प्रशासन विफल नजर आता है, इस कारण यह समस्या बढ़ गई है, अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि शासन के किस विभाग ने पार्किंग स्थल का अन्य प्रयोजन के लिए प्रयोग करने की अनुमति प्रदान की है . रोजाना सुबह और
शिकायत की है कि उनी कपड़े, स्वेटर, शाल के व्यवसायियों को यह स्थान व्यवसायिक प्रयोजन के लिए नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि इससे ट्राफ़िक व्यवस्था बिगड़ जाती जाती है और इस व्यस्ततम स्थान पर पार्किंग की व्यवस्था भी खत्म हो जाती है, जिसके कारण हमेशा दुर्घटनाएं होती है और भयंकर दुर्घटना घटने की संभावना बनी रहती है, रात में बड़े वाहन और ट्रक इस मार्ग पर खतरनाक हो जाते हैं इसलिए इस स्थान को पार्किंग के लिए सुरक्षित किया जाना चाहिए और व्यवसायिक गतिविधियों के लिए अन्यत्र व्यवस्था की जानी चाहिए ।

भिलाई। अपहरण का एक केस पुलिस ने सुलझा लिया। इस मामले में 16 साल की किशोरी लापता थी वह भी अब मिल चुकी है। दरअसल शहर के पावर हाउस अंडर ब्रिज से बीते बुधवार रात से किशोरी लापता थी। सोशल मीडिया से जानकारी मिलने पर पुलिस ने छानबीन शुरू की।  छावनी थाना पुलिस इस मामले में दुर्ग रेलवे स्टेशन पहुंची। यहां वह लापता बच्ची मिल गई। इसके बाद बच्ची ने अपने लापता होने का जो कारण पुलिस को बताया वह हैरान करने वाला था। 



बच्ची ने बताया कि वह अपने पिता की नशे में रहने की लत और मारपीट से बचने भागकर दुर्ग चली गई थी। जिस बदमाश पर बच्ची के अपहरण करने की शंका थी उसके साथ नाबालिग बच्ची के दिव्यांग पिता ने शादी का रिश्ता तय कर दिया। दोनों की सगाई भी हो गई। अब नाबालिग के कहने पर दो साल बाद शादी करने का फैसला लिया गया। पावर हाउस अंडर ब्रिज के नीचे रहने वाला 52 वर्षीय दिव्यांग बुजुर्ग शुक्रवार को अपनी बेटी की फोटो लेकर उसे तलाश रहा था। छावनी सीएसपी विश्वास चंद्राकर ने बताया कि बच्ची के अपहरण की सूचना सोशल मीडिया के जरिए लगी थी। हालांकि पिता ने इसकी शिकायत नहीं की थी। 


दुर्ग।  इटली से आई दंपति ने एक बच्चे को गोद लिया। लंबे अरसे इस दंपत्ति की सूनी गोद में अब खुशियां पहुंची हैं। जिस मासूम को 11 महीने की उम्र में असल मां-बाप ने अपाहिज मानकर छोड़ दिया था। वह बच्चा अब इटली में रहेगा पढ़ेगा और अपने नए माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनेगा। मातृछाया नाम की संस्था ने इस बच्चे की 4 सालों तक देख-रेख की। संस्था के डॉ सुधीर हिशीकर ने बताया कि गोद दिए गए बच्चे का नाम बाला है। सही देख रेख की वजह से अब वह बेहद स्वस्थ है। इंटरनेट से मिली जानकारी उन्होंने बताया कि 11 महीने की उम्र में यह हमारे पास आया था। इसके असल माता-पिता ने अस्पताल में इसे छोड़ दिया था महिला एवं बाल विकास विभाग ने हमें इसकी देखभाल की जवाबदारी दी। इंटरनेट में हम बच्चों की जानकारी अपलोड करते हैं। कोई भी इन बच्चों को गोद ले सकता है। यही देखकर इटली से मोरोएलियन अपनी पत्नी निगरीस वेलेनिटना के साथ आए। लीगल औपचारिकताओं के बाद बच्चा उन्हें सौंपा गया। मोरो पेशे से आर्किटेक्ट हैं उनकी पत्नी एक फिजियोथेरेपिस्ट हैं।



दुर्ग की मातृछाया संस्था पिछले 6 सालों से इस क्षेत्र में काम कर रही है। अब तक 51 बच्चों का एडॉप्शन हुआ। इससे पहले 3 बच्चों को अमेरिका की दंपति गोद ले चुकी हैं। डॉ. सुधीर ने बताया कि दिव्यांग या मामूली स्वास्थ सम्बंधी परेशानियों के चलते भारतीय दंपति बच्चों को गोद नहीं लेना चाहती इन मामलों में विदेशी जोड़ों की सोच बिल्कुल अगल है। हमारी संस्था के बार झूला लगा हुआ है। लोग यहां अपने बच्चों को छोड़ जाते हैं। वर्तमान में हमारे यहां 6 बच्चे रह रहे हैं इनमें दो महज दो महीने के हैं।

दुर्ग।  नगर निगम क्षेत्र में 5 वें स्थल कंडरापारा वार्ड 34 में दलदल से भरी हुई सरकारी भूमि पर अब 637 गरीब परिवारों का आशियाना बनेगा। स्लम बस्ती वासियों के आग्रह पर विधायक द्वारा लगातार शासन स्तर पर प्रयास किया गया था जिसके फलस्वरूप अब 30 करोड़ 57 लाख रु की राशि से प्रधानमंत्री आवास बनाने का कार्य ठेका एजेंसी ओम एसोसिएट्स द्वारा प्रारंभ कर दिया गया है। आवास की प्रगति की जानकारी ली जिसपर अधिकारियों ने बताया कि लदली भूमि के बगल में तालाब होने के कारण कार्य करने में असुविधा हो रही है आज से ही तालाब को खाली करने का कार्य एवं रिक्त भूमि के समतलीकरण का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है जिससे आवास बनाने में रुकावट ना हो एवं निश्चित की गई डेढ़ साल की अवधि में आवासहीनों को मकान उपलब्ध कराया जा सके। वोरा ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि आसपास के क्षेत्रों में संक्रामक बीमारी फैलती रही है इस पर ध्यान देते हुए व्यवस्था ऐसी बनाई जाए कि आवास योजना में मकान लेने वाले हितग्राहियों के स्वास्थ्य एवं मूलभूत आवश्यकताओं की दिक्कत ना हो एवं पहुंच मार्ग व गुणवत्ता युक्त सामग्री का उपयोग हो। साथ ही प्रयास किया जाए कि निर्माण से लेकर आबंटन की प्रक्रिया में नगर निगम द्वारा अनावश्यक विलंब ना हो।

दुर्ग।  फेसबुक पर कार बेचने का विज्ञापन देखकर दुर्ग नगर निगम का सुपरवाइजर दो लाख की ठगी का शिकार हो गया। विगत 6 माह पूर्व निगम कर्मी रिक्की समुंद्रे ने आरोपी सुमित पाठक से संपर्क किया। कार को रिक्की तक भेजने के नाम पर आरोपी ने 2 लाख रुपए पेटीएम करवा लिए। लेकिन न तो कार पहुंची और न ही रुपए लौटाए गए। घटना  अब जांच के बाद आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर पुलिस उसकी तलाश में जुट चुकी है।  पुलिस ने बताया कि पीडि़त रिक्की ने मार्च में अपने फेसबुक आईडी पर मार्केट पैलेस नाम का पेज देखा। 


पेज पर कार देखकर उसने बेचने वाले से संपर्क किया। ठग ने खुद को राजस्थान सेना में पदस्थ होने बताकर सुपरवाइजर को विश्वास में ले लिया। गाड़ी राजस्थान से कोरियर से  भेजने का वादा किया। पुलिस ने बताया कि आरोपी ने प्रार्थी से कोरियर चार्ज 10 हजार रुपए जमा करवा लिया। अगले दिन डिलेवरी देने आए युवक ने सुपरवाइजर से संपर्क किया। उसने कोरियर सर्विस के अकाउंट में गाड़ी देने के पहले 21 हजार रुपए सिक्योरिटी अमाउंट जमा करवा लिया। पैसा जमा करने में 20 मिनट लेट हो गया तो जीपीएस चार्ज जमा करने के लिए कहा गया। सुपरवाइजर ने पैसों के इंतजाम किया और निर्धारित समय से 15 मिनट देरी से 31 हजार रुपए जमा किए। समय पर पैसा नहीं जमा करने पर उससे ठग ने दोबारा लेट फीस जमा करने के लिए कहा। इस बार सुपरवाइजर ने 47 हजार 5 सौ रुपए जमा किए। बदमाश ने इस बार उसे कहा कि डिलेवरी कैंसिल हो गई है। दोबारा गाड़ी की बुकिंग करने के लिए 51 हजार रुपए जमा करना होगा। इसके बाद 24 घंटे के भीतर गाड़ी की डिलेवरी हो जाएगी। इस तरह प्रार्थी को बेवकूफ बनाया गया। 

दुर्ग।  आगामी दिनों में त्योहारी बाजार को देखते हुए ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त करने को लेकर गुरुवार को निगम व पुलिस विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों ने संयुक्त बैठक की। बैठक में तय किया गया कि बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था के लिए बेहतर पार्किंग व सड़क पर पसरा लगाकर व्यापार लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। इसके लिए तय किया गया कि 19 अक्टूबर से संयुक्त टीम प्रमुख बाजारों का निरीक्षण करेगी और साथ ही कार्रवाई की जाएगी।





व्यवस्था दुरूस्त करने निगम और पुलिस अफसरों की बैठक हुई। बेतरतीब पार्किंग तो दुकानदार पर कार्रवाई मुहिम के दौरान दुकानों के सामने बेतरतीब पार्किंग मिलने पर दुकानदारों पर कार्रवाई की जाएगी। बाजार के अंदर, बाहर किसी भी दुकानदार द्वारा पसरा, ठेला, दुकानदार के बाहर तक सामान रख कर दुकान सजाई जाती है, तो भी कार्रवाई होगी। त्योहार के समय दीया, फूल माला, फोटो बेचने वाले लोग बाजार क्षेत्र में एक लाईन से दुकान लगाकर बैठेंगे। इस बार विशेष ध्यान दिया जाएगा की आवाजाही बाधित न हो।



वाहनों को बाजार तक पहुंचने से रोका जाएगा इधर यह भी तय किया गया कि वाहन बाजार तक न पहुंचे, इसके लिए पार्किंग सुनिश्चित की जाएगी। पटेल चौक के तरफ से आने वाले वाहनों को टीबी हास्पिटल मैदान में खड़ा कराया जाएगा। इसी प्रकार सराफा बाजार आने वाले लोगों के लिए शनिचरी बाजार में पार्किंग दी जाएगी। इन जगहों पर समतलीकरण कर प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। स्टेशन की तरफ से आने वाले वाहनों को पचरीपारा चौक के करीब नियंत्रित किया जाएगा।

पूरब टाइम्स , दुर्ग . इस बार नगर निगम के महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होने से कई बड़े राजनेताओं की योग्यता की परीक्षा होने वाली है जिनमें से एक होंगे , दुर्ग शहर के विधायक अरुण वोरा . पिछले कई चुनाव हारने के बाद भी उन्हें बराबर विधायक पद के लिये कांग्रेस ने प्रत्याशी घोषित किया उसका कारण शायद दिल्ली के हाई कमान में , मोतीलाल वोरा की घुसपैठ मानी जाती रही . केवल इतना ही नहीं वे लोग दुर्ग में 20 सालों से अपना महापौर नहीं जितवा पाये. दबी ज़ुबान से अनेक राजनेताओं का कहना है कि यह सब , भाजपा की एक नेत्री के साथ ,  एक अंदरूनी पैक्ट के कारण होता था . लेकिन इस बार यह कर पाना संभव नहीं है क्योंकि इस बार की हार से , प्रदेश कांग्रेस सरकार के मुखिया कुपित होकर , अरुण वोरा को मिल सकने वाली लाल बत्ती पर हमेशा के लिये रोक लगा दें.  पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट ...

दुर्ग नगर निगम की ऑडिट रिपोर्ट आने वाले समय में कई राजनैतिक मामलों का मसाला राजनैतिक मुद्दों के रूप में देने वाली है .  सूत्रों के अनुसार दुर्ग सिट के एक राजनैतिक दावेदार ने प्रोफेशनल सलाहकार चुनावी  रणनीति बनाने के लिए हायर किया है ,जिसने निगम ऑडिट रिपोर्ट में प्रकाशित कई ज्वलंत मामले ऑडिट रिपोर्ट से निकाले है . ये मामले सीधे मतदाताओं को प्रभावित करेंगे इन मामलों को ऑडिट रिपोर्ट की प्रमाणिकता के आधार पर जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा.  इस सुनियोजित राजनैतिक हलचल का असर सीधे युवराज अरुण वोरा को प्रश्नाकित करेगी क्योकि अरुण वोरा ने दुर्ग निगम के भ्रष्टाचार पर कभी भी प्रतिक्रिया नहीं की और कभी भी जनता के समक्ष यह सुनिश्चित नहीं कराया कि निगम अनियमितता के  मामलों में दुर्ग विधायक अपने पदेन जिम्मेदारी निभाता है . इस राजनैतिक हलचल से कांग्रेस के गुट भी आमने-समाने नजर आयेंगे और भाजपा के दावेदार भी प्रभावित होंगे भाजपा और कांग्रेस के बड़े दिग्गज मोतीलाल वोरा और सरोज पाण्डेय भी अपने ही दुर्ग में उलझ जायेंगे .

दुर्ग निगम का वाटर फि़ल्टर प्लांट जन स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए कितना काम कर रहा है इसका आकलन करने के लिए जनता उन आकड़ो और दस्तावेजो को पब्लिक डोमेन पर लाने की मांग कर रही है , जिससे यह स्पष्ट हो सके है कि दुर्ग निगम क्षेत्र में पीलिया और अन्य संक्रामक बीमारियाँ क्यों फैलती है ? इस मामले में कई बार आरोप प्रत्यारोप हुए लेकिन सभी कार्यवाही अब तक निगम अभिलेखों में दफन है  . जन स्वास्थ्य से सीधे जुडा यह मामला आने वाले समय में मतदाताओ को आकर्षित करेगा और इस मामले को जो भी उठायेगा वह जनता के लिए आकर्षण का केंद्र होगा .

वरिष्ट नागरिक को प्रभावित करने के लिए तत्कालीन महापौर सरोज पाण्डेय ने दादा-दादी और नाना-नानी पार्क निर्माण कार्य कराया था लेकिन इसके बाद के महापौर कार्यकाल में ये पार्क निगम अवहेलना का शिकार हो गए अब इन पार्क में उपलब्ध सुविधाए वैसी नहीं रही जैसे तब थी इसलिए इस पार्क के जीर्णोधार का मुद्दा वरिष्ट नागरिको को प्रभावित करने वाला है

पूरब टाइम्स . भिलाई की शान बना छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकि युनिवर्सिटी (सीएसवीटीयू ) आजकल कचरे के ढेर से ढंका हुआ दिखता है .  इस कैम्पस के लिये पहुंच मार्ग पूरी तरह से कचरे , गन्दगी के ट्रेंचिग मैदान पर से गुजऱता है जहां  हर वक़्त भिलाई स्टील प्लांट व निगम का कचरा फेंकते हुए देखा जा सकता है .  आलम यह है कि जब भी ज़ोर से हवा चलती है पूरा विश्व विद्यालय कैम्पस बदबू से भर जाता है . पूर्व में भी इस गन्दगी को लेकर कतिपय पारषदों व स्थानीय निवासियों ने प्रदर्शन कर अपना विरोध जताया था परंतु तब की सरकार के स्थानीय मंत्री के कानों में जूं नहीं रेंगी . अब भी विद्यार्थी, संस्थान का पूरा स्टाफ व स्थानीय निवासी परेशान हैं पर इस समस्या के निदान के लिये कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है . स्थिति विस्फोटक होने लगी है और किसी भी दिन आंदोलन हो सकता है . पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट

कचरे के ढेर से घिरा विश्विद्यालय,बना गन्दगी की पहचान

प्रदेश का तकनीकि विश्वविद्यालय इन दिनों कचरे के ढेर से अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है . स्थानीय नेता जिन्होंने इसके उद्घाटन भाषण में बड़ी-बड़ी बाते करके इस विश्वविद्यालय को महिमामंडित मंडित किया था वे उस समय अति उत्साह के चलते इस कचरे के ढेर को शायद देख नहीं पाए थे क्योंकि तब इस कचरे के ढेर ने अपना विकराल रूप नहीं लिया था लेकिन अब स्थिति आ गयी है कि मुख्य सड़क से देखने पर यह विश्व विद्यालय अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी बिल्डिंग की ऊंचाई के सहारे संघर्ष करता दिखाई पड़ता है . मुख्य सड़क से विश्वविद्यालय की सड़क जहाँ मिलती है भ्रष्टाचार और माफिया संरक्षण का एक जीता जागता सबूत स्थानीय प्रशासन को ललकारता हुआ दिखाई पड़ता है . पर विडंबना यह है कि बीएसपी के बड़? अधिकारियों , छात्र राजनीति से मुख्य राजनीतिक धारा अपना स्थान बनाने वाले महापौर देवेन्द्र व वर्तमान में सरकार के बड़े नुमाइंदों   की वीआईपी गाडियों से इन्हें कचरे दिखाई नहीं पड़ता है . अवैध टेंचर ग्राउंड में तब्दील विश्विद्यालय का कैम्पस इनकी उदासीनता को भी प्रमाणित करता है।

पर्यावरण मंडल और प्रशासन कचरे के अवैध संधारण पर खामोश क्यों है ?

विश्वविद्यालय प्रशासन कचरे के अवैध ढेर पर खामोश क्यों है ?इसका पता लगाने का प्रयास किया गया तो तथाकथित चौकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस विश्वविद्यालय कैपस को मुरम माफिया ने खोद कर विकृत रूप दे दिया है, अवैध तरीके से मुरुम निकलकर बेच दी गई है . ऐसा लगता है कि जब यह अवैध धंधा चल रहा था तब विश्वविद्यालय प्रशासन मौनानुकुलता से मुरुम माफियाओ को संरक्षण दे रहा था और नेताओ और प्रशासन ने इसे रोकने का प्रयास नहीं किया . टनों में एकत्रित यह कचरा अपनी बदबू और गंदगी से अब आम जनता के साथ-साथ प्रेस और मिडिया का ध्यान आकर्षित करने लगा है इसलिए क्या अब प्रशासन इस अनियमितता को छिपाने के लिए इन अवैध जानलेवा गढ़ों को कचरे से पाट रहा है ? इस बात् को मौके पर जाकर अनुभव किया जा सकता है .

एन.एस.यू.आई और भारतीय जनता युवा मोर्चा ... मूक दर्शक क्यों ?

विश्वविद्यालय के गंदे कैम्पस और अन्य अनियमित्ताओ पर कांग्रेस और भाजपा के युवा विंग दुबके बैठे है ,जिसका कारण यह दिखाई पड़ता है कि दोनों बड़ी पार्टी के आदमकद राजनितिक ओहदेदार अपने आगे किसी युवा को बर्दाश्त करना नहीं चाहते . क्योकि स्थानीय दोनों जनप्रतिनिधियों को यह मालूम है कि उनकी भी उत्पत्ति ऐसे ही छोटे-छोटे मामलो को उठाने के कारण हुयी है इसलिए अगर इस समय किसी भी छात्र नेता ने अपनी उपस्थिति भिलाई विधानसभा क्षेत्र में दर्ज करा दी तो निश्चित की उनके लिये सिर दर्द पैदा कर सकता है . सुबह-सवेरे झाड़ू लेकर निकलने वाले नेताओ को तकनीकि विश्विद्यालय से निकलने वाला , अंकुरित होने वाला छात्र नेता चुनौती दे सकता है इसलिए यह मामला ठंडे बस्ते में है .

पूरब टाइम्स, रायपुर . एक तरफ जहां केन्द्र सरकार युवाओं व बेरोजग़ारों को किसी विधा में निपुण कर उन्हें रोजगार के लिये काबिल बनाने की कोशिश कर रही है , वहीं इस  तरह की स्कीमों का कार्यान्वयन राज्य सरकार के द्वारा कराया जाता है . फिर क्या बात है कि इतने खर्च व ट्रेनिंग के बावजूद युवा ना स्वरोजगार शुरू कर पा रहे हैं और ना ही उचित रोजगार पा रहे हैं ? मामले की लगातार मॉनिटरिंग कर उसमें बेहतरी करने की कोशिशें सरकार द्वारा की जा रही है पर क्या वे पर्याप्त हैं? पुराने युवाओं का क्या हो रहा है? पूरब टाइम्स की के रिपोर्ट...
जब युवाओं को रोजगार से जोडऩे की बात आती है तो तो हमारा प्रशासनिक तंत्र तरह-तरह के कारण बताकर अपने विफलता को छिपाने का प्रयास करता रहता है . जिला स्तर पर बैठा प्रशासनिक अधिकारी संचालक स्तर की कमियों को बताता है और संचालक के पद पर बैठा अधिकारी अपने विफल कार्य योजना को जिला स्तर के अधिकारी की विफलता बताकर अपने आप को बचाने का प्रयास करता रहता है . निश्चित तौर पर दोनों ही स्तरों पर कोई ना कोई कमी है ,  जिसके कारण आज बेरोजगारी की समस्या का निराकरण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं कर पा रही हैं . हमारा शासकीय तंत्र या तो बौद्धिक दृष्टिकोण से इस समस्या का समाधान करने के लायक नहीं है या उसकी मंशा बेरोजगारी की समस्या खत्म करने की नहीं है . कारण कोई भी हो बेरोजगारी की समस्या आज हमारे सामने खड़ी है और विकराल रूप ले चुकी है.  अगर समय रहते इस पर हमारा प्रशासन बेरोजगारी की समस्या को काबू में नहीं कर सकेगा तो युवाओं का देश कहा जाने वाला भारत जल्द ही युवाओं की बेरोजगारी से हार जाएगा और इसके दुष्परिणामों को आम जनता को भोगना पड़ेगा .  इसलिए आवश्यक है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र की नियमित समीक्षा की जाए और इस समीक्षा में जनप्रतिनिधि और समाजसेवियों को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। 
कहते हैं कि रंगमंच और फिल्में सामाजिक व्यवस्था का आईना होती है और वे ऐसी समस्याओं को रंगमंच पर लाने के लिए कलाकार को प्रेरित करती है जो आम जनता से जुड़ी हों.  80 के दशक की फिल्में हो या वर्तमान दशक की फिल्में , दोनों ही समय की फिल्मी कहानियों में बेरोजगारी अपना अस्तित्व दिखाती है . फिल्मी नायक बेरोजगारी की समस्या से जूझता दिखता है इसलिए यह तो स्पष्ट है कि आजादी के पहले और आजादी के बाद से अब तक हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था ने बेरोजगारी पर काबू नहीं पाया . आज की सरकारें जो केंद्र और राज्य में निर्वाचित होकर पदासीन हुई है,  इनके पास भी बेरोजगारी की समस्या के निराकरण का कोई सार्थक हल नहीं दिख रहा है . वैसे सरकार किसी भी कार्य को करने के लिए पूरी तरह प्रशासनिक तंत्र पर निर्भर होती है इसलिए प्रशासनिक तंत्र के अधिकारियों की नियुक्ति उनके बौद्धिक क्षमता के आधार पर की जाती है . लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें निर्वाचित नहीं किया जाता . प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर शासकीय अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं , प्रतियोगी परीक्षाओं में लोक सेवक बौद्धिक क्षमता का आकलन करवाते हैं . बेरोजगारी की समस्या इस बात का प्रमाण है कि जिस बौद्धिक क्षमता का आकलन करके शासन ने अपने अधिकारियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था से प्राधिकृत किया है , वे बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए असक्षम है और बेरोजगारी की समस्या का निराकरण नहीं कर पा रहे हैं . इसलिए आवश्यक हो गया है कि कौशल विकास के लिए कार्य कर रहे अधिकारियों को प्रश्नंकित किया जाए और उनके कार्यों की समीक्षा करने के तंत्र विकसित करने करने की दिशा में प्रदेश बढऩा चाहिए