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शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार से जोडऩे के लिए क्या कर रहा है प्रदेश शासन, कौशल विकास मिशन के कार्यान्वयन में विकेंद्रित क्यो है प्रशासनिक लक्ष्य ?

09/10/2019
पूरब टाइम्स, रायपुर . एक तरफ जहां केन्द्र सरकार युवाओं व बेरोजग़ारों को किसी विधा में निपुण कर उन्हें रोजगार के लिये काबिल बनाने की कोशिश कर रही है , वहीं इस  तरह की स्कीमों का कार्यान्वयन राज्य सरकार के द्वारा कराया जाता है . फिर क्या बात है कि इतने खर्च व ट्रेनिंग के बावजूद युवा ना स्वरोजगार शुरू कर पा रहे हैं और ना ही उचित रोजगार पा रहे हैं ? मामले की लगातार मॉनिटरिंग कर उसमें बेहतरी करने की कोशिशें सरकार द्वारा की जा रही है पर क्या वे पर्याप्त हैं? पुराने युवाओं का क्या हो रहा है? पूरब टाइम्स की के रिपोर्ट...
युवाओं को रोजगार से जोडऩे के लिए जिला स्तर पर कार्यरत प्रशासनिक तंत्र के कार्यों की नियमित समीक्षा होती है क्या?
जब युवाओं को रोजगार से जोडऩे की बात आती है तो तो हमारा प्रशासनिक तंत्र तरह-तरह के कारण बताकर अपने विफलता को छिपाने का प्रयास करता रहता है . जिला स्तर पर बैठा प्रशासनिक अधिकारी संचालक स्तर की कमियों को बताता है और संचालक के पद पर बैठा अधिकारी अपने विफल कार्य योजना को जिला स्तर के अधिकारी की विफलता बताकर अपने आप को बचाने का प्रयास करता रहता है . निश्चित तौर पर दोनों ही स्तरों पर कोई ना कोई कमी है ,  जिसके कारण आज बेरोजगारी की समस्या का निराकरण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं कर पा रही हैं . हमारा शासकीय तंत्र या तो बौद्धिक दृष्टिकोण से इस समस्या का समाधान करने के लायक नहीं है या उसकी मंशा बेरोजगारी की समस्या खत्म करने की नहीं है . कारण कोई भी हो बेरोजगारी की समस्या आज हमारे सामने खड़ी है और विकराल रूप ले चुकी है.  अगर समय रहते इस पर हमारा प्रशासन बेरोजगारी की समस्या को काबू में नहीं कर सकेगा तो युवाओं का देश कहा जाने वाला भारत जल्द ही युवाओं की बेरोजगारी से हार जाएगा और इसके दुष्परिणामों को आम जनता को भोगना पड़ेगा .  इसलिए आवश्यक है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र की नियमित समीक्षा की जाए और इस समीक्षा में जनप्रतिनिधि और समाजसेवियों को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। 
बेरोजगारी की समस्या का निराकरण क्या संभव है ?
कहते हैं कि रंगमंच और फिल्में सामाजिक व्यवस्था का आईना होती है और वे ऐसी समस्याओं को रंगमंच पर लाने के लिए कलाकार को प्रेरित करती है जो आम जनता से जुड़ी हों.  80 के दशक की फिल्में हो या वर्तमान दशक की फिल्में , दोनों ही समय की फिल्मी कहानियों में बेरोजगारी अपना अस्तित्व दिखाती है . फिल्मी नायक बेरोजगारी की समस्या से जूझता दिखता है इसलिए यह तो स्पष्ट है कि आजादी के पहले और आजादी के बाद से अब तक हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था ने बेरोजगारी पर काबू नहीं पाया . आज की सरकारें जो केंद्र और राज्य में निर्वाचित होकर पदासीन हुई है,  इनके पास भी बेरोजगारी की समस्या के निराकरण का कोई सार्थक हल नहीं दिख रहा है . वैसे सरकार किसी भी कार्य को करने के लिए पूरी तरह प्रशासनिक तंत्र पर निर्भर होती है इसलिए प्रशासनिक तंत्र के अधिकारियों की नियुक्ति उनके बौद्धिक क्षमता के आधार पर की जाती है . लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें निर्वाचित नहीं किया जाता . प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर शासकीय अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं , प्रतियोगी परीक्षाओं में लोक सेवक बौद्धिक क्षमता का आकलन करवाते हैं . बेरोजगारी की समस्या इस बात का प्रमाण है कि जिस बौद्धिक क्षमता का आकलन करके शासन ने अपने अधिकारियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था से प्राधिकृत किया है , वे बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए असक्षम है और बेरोजगारी की समस्या का निराकरण नहीं कर पा रहे हैं . इसलिए आवश्यक हो गया है कि कौशल विकास के लिए कार्य कर रहे अधिकारियों को प्रश्नंकित किया जाए और उनके कार्यों की समीक्षा करने के तंत्र विकसित करने करने की दिशा में प्रदेश बढऩा चाहिए