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गुस्ताखी माफ: जनता कंफ्यूज़ हो रही है कि कौन रावण और किसका रावणराज ?

30/09/2019

भिलाई के खुर्सीपार क्षेत्र में जलाये जाने वाले रावण उत्सव की दूर दूर तक ख्याति है. कारण है,  उसका भव्य आयोजन व उसकी आतिशबाज़ी. पिछले कुछ सालों से भाजपा की पूर्व सरकार के मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय का इस आयोजन समिति में वर्चस्व रहा था . इसमें जुड़े लोगों के संरक्षक होत थे , मंत्री पुत्र मनीष पाण्डेय . भाजपा के पिछले कार्यकाल में इनकी एकतरफा तूती बजती थी. विरोध करने वाले  कितना व कहां दबाये जाते या फेंक दिये जाते थे , इसका लोग अंदाज़ भी नहीं लगा पाते थे. सही मायने में वही रावण राज था . हमारे एक साथी ने कहा तो दूसरा साथी बोला ,  लेकिन मनीष पाण्डेय ने तो अभी के विधायक व महापौर देवेंद्र यादव पर रावण राज का इल्ज़ाम लगाया है  और यह भी आरोप लगाया है कि अपने रसूख के दम पर देवेंद्र यादव ने खुर्सीपार में रावण जलाने की अनुमति उनके समर्थकों की समिति से छीन कर अपने समर्थकों की समिति को दिलवा दी है .मनीष की आक्रामकता का अंदाज़ इस बात से लगा सकते हैं कि वे शहर में जलाने-मारने काटने की बात भी कह रहे हैं. अब तीसरा साथी बोला , जब  मनीष के पिता शासन में थे तो यही धमकी शेर की दहाड़ लगती और उनके बोलने भर से लोग दुबक जाते थे . अब वह धमकी गीदड़ भभकी लगती है जिसे साबित करने के लिये उन्हें कुछ करना ही पड़ेगा . अब मैं बोला , यह ज़माना जिधर बम उधर हम का है या फिर जिसमें राजनीतिक दम उधर प्रशासनिक अमले का है. प्रेमप्रकाश  पाण्डेय के समय मनीष ने उस बात को बहुत एंजॉय किया है . अब देवेंद्र यादव  सत्ता में है सो उन्हें उस ताक़त का मज़ा लेने देना चाहिये . नाहक में एक दूसरे को रावण बोलकर आम जनता में उत्सुकता जगाते हैं कि वास्तविक में रावण कौन है ? अब पत्रकार माधो बोल पड़े, इस बात पर खम भरने के पीछे दोनों पक्षों की दूर की लड़ाई है . भिलाई नगर निगम के महापौर का पद अब सामान्य वर्ग से घोषित हो गया है और  इसके लिये अभी से दावेदारी नहीं दिखायेंगे और अपने समर्थकों का मनोबल नहीं बढ़ायेंगे तो मनीष पाण्डेय,  आगे चुनाव जीतना तो दूर , अपनी पार्टी से चुनाव की टिकिट भी नहीं पायेंगे. रही दूसरे खेमे की बात , वे कांग्रेसी हैं परंतु उन्होने मोदीजी से सीख लिया है कि अपनी अच्छाई दिखाने से ज़्यादा असरकारक ,है दूसरे के इतिहास की बुराई दिखाना , इससे चुनाव बड़ी आसानी से जीता जा सकता है . पर यहां खास बात रही देवेंद्र यादव की चुप्पी और उनके मोहरे लक्ष्मीपति राजू की सक्रियता . आप समझ ही सकते हैं कि यह किस ओर इशारा करता है ?