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दुर्ग जिला सहकारिता : क्या इस बार के चुनाव में भूपेश बघेल सरकार प्रीतपाल बेलचंदन का अस्तित्व खत्म कर देगी.. क्या बेलचंदन के पुराने अनियमित कार्यों का भूत फिर से उठ खड़ा होगा..

18/01/2021
इस बार प्रीतपाल बेलचंदन, भूपेश बघेल सरकार पर भारी पड़ेंगे या इनके चंगुल से मुक्त हो जायेगा प्रदेश में सहकारिता आंदोलन?

छत्तीसगढ़ का सहकारिता आंदोलन को दबाने और कुचलने वाला कौन है ? किनके कारण सहकारिता का क्षेत्र बदनाम हुआ ?

क्या आने वाले समय में प्रीतपाल बेलचंदन से पुराने कार्यों का हिसाब किताब मांगा जायेगा ? स्मृति नगर सोसाइटी की जांच रिपोर्ट भी कब होगी सार्वजनिक ?

क्यों छत्तीसगढ़ का सहकारिता आंदोलन गलत दिशा में चला गया है ? वह कौन है जिसने छत्तीसगढ़ के सहकारिता आंदोलन को पनपने से रोक दिया ?

पूरब टाइम्स , दुर्ग. दुर्ग जिले और छत्तीसगढ़ का सहकारिता आन्दोलन , चन्द राजनेताओं व कतिपय रसूखदार लोगों की अगुवाई के कारण मृतप्राय हो चुका है . प्रदेश का सबसे नामी सहकारी  बैंक , जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक दुर्ग  सबसे बड़ी सहकारी हाउसिंग सोसाइटी , स्मृति नगर को ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी , दोनो अपने सर्वोच्च  नेतृत्व ,  कार्यशैली व भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण लगातार , खबरों की सुर्खियों में रहे परंतु सोसाइटी पर नियंत्रण रखने वाले कोई भी सरकारी तंत्र इनका बाल भी बांका नहीं कर पाया . सूत्रों के अनुसार , यह सब उन पर राजनैतिक संरक्षण के कारण ऐसा नहीं हो पाया . अब फिर से ये मामले सुर्खियों में हैं . जिसका प्रमुख कारण है कि दुर्ग जिले की सोसाइटियों के चुनाव होने हैं और अनेक वर्षों से अध्यक्ष पद पर काबिज प्रीतपाल बेलचंदन अब भाजपा से इस्तीफा देकर पार्टी विहीन होकर चुनाव लड़ेंगे . पूर्व में दुर्ग ग्रामीण विधानसभा से चुनाव हारे हुए बेलचंदन , कांग्रेस में प्रवेश की आस लगाये बैठे थे पर ऐसा नहीं होने से वह दोनो पार्टियों के समर्थित उम्मीदवारों से दो-दो हाथ करने के लिये मजबूर हो गये हैं . वहीं स्मृति नगर सोसाइटी भी नगर निगम भिलाई की शहर सरकार के कार्यकाल के खत्म होते ही , पुरानी जांच के आधार पर फिर से सरकारी शिकंजे में कसे जाने की संभावना है . पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट ....


भाजपा के प्रदेश शासन के 15 सालों में सहकारिता आंदोलन को पूर्ण विराम लगाने वाला तथाकथित सहकारी नेता कहीं प्रीतपाल बेलचंदान तो नहीं था ?

भाजपा शासन के पंद्रह सालों में छत्तीसगढ़ राज्य ने बहुत प्रगति की लेकिन इस कार्यकाल की विफलताओं कई विषय आते हैं .  उसमे सबसे अग्रणी स्थान,  सहकारिता आंदोलन का है क्योंकि इसी कालखंड में महाराष्ट्र और गुजरात का सहकारी आंदोलन अपनी नई ऊंचाइयां तय करके राष्ट्रीय स्तर पर सबसे आगे बना रहा है . गौर तलब रहे कि छत्तीसगढ़ के सहकारिता आंदोलन , बीस वर्ष पहले बहुत विस्तृत स्वरूप मे था और राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान थी . इसकी गवाही आज भी बनकर संघ के टूटे फुटे भवन और धूल मिट्टी खाती हथकरघा मशीन दे रही है और अपनी बंद अवस्था का वास्ता देकर यह पूछ रहीं हैं कि छत्तीसगढ़ के सहकारी आंदोलन के पीठ में आखिर किसने छूरा भोंका है ?


छत्तीसगढ़ के सहकारिता आंदोलन को कानूनी दावपेंच और छल कपट के मकड़ जाल में धंसा कर किसने अस्तित्व विहीन बना दिया ?

छत्तीसगढ़ का सहकारी आंदोलन विगत कई वर्षों से दिशा विहीन हो गया है . जिसके कारण का अंदाजा लगाना तब बेहद मुश्किल नहीं है ,  जब सहकारिता क्षेत्र के भ्रष्टाचार की खबरें अपनी जगह सुर्खियों में बना लेती है और इसका नतीजा नहीं निकलता है तथा सहकारिता क्षेत्र के नेता इस मामले को अदालतों मे ले जाकर उलझा देते है और अंतहीन कानूनी प्रक्रिया के हवाले कर देते है . विडंबना यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ का सहकारिता आंदोलन न्यायालय की गलियों में भटकर भ्रष्टाचार नामक घाव की समस्या का समाधान खोजने की मशक्कत कर रहा होता है तब सहकारिता आंदोलन के नेता कानूनी मामले को गंभीरता से सुलझाने के लिए कोई प्रयास करते नजर नहीं आते हैं . जबकि होना यह चाहिए कि सहकारिता की प्रक्रिया अनुसार सर्व सम्मति और पारदर्शिता के साथ सभी समस्याओं और आरोपों का विधि सम्मत समाधान खोजा जाना चाहिए क्योंकि सहकारिता का मूल मंत्र है सहकारिता और आपसी सहमति है . 

क्या भूपेश बघेल सरकार छत्तीसगढ़ के सहकारिता आंदोलन को दबाने व कुचलने वाले घटकों से मुक्त करवा पाएगी ?

भाजपा की रमन सरकार सहकारिता आंदोलन को दबाने और कुचलने वाले घटकों से मुक्त नहीं करवा पाई इसका उदाहरण छत्तीसगढ़ का सहकारिता आंदोलन बैंकिग और निर्माण दोनों ही क्षेत्र में विफल होकर साबित कर रहा है . इससे भी एक कदम आगे चलकर छत्तीसगढ़ की गृह निर्माण समितियां भारी गड़बडिय़ों मे फंसकर ध्वस्त हो गई हैं . चिट फंड कंपनियां भी सहकारिता आंदोलन को बदनाम करके,  सहकारिता के प्रति आम आदमी के विश्वास को खत्म करने के कगार पर लाकर खड़ा कर चुकीं है लेकिन छत्तीसगढ़ की विगत भाजपा सरकार सहकारिता आंदोलन को बचाने में पूरी तरह विफल रही . अब वर्तमान भूपेश बघेल सरकार से सहकारिता आंदोलन को बहुत सी आशाएं है लेकिन आने वाला समय बताएगा कि प्रीतपाल बेल चंदन का वर्चस्व सहकारिता क्षेत्र में रहेगा कि भूपेश सरकार की उपस्थिति सहकारिता क्षेत्र में नजर आएगी

सहकारिता आंदोलन को बचाने के लिए आवश्यक है कि सहकारी समितियों की कार्यवाहियों की जांच नियमित होनी चाहिए और इनके लेखा जोखा तक समिति के सभी सदस्यों की पहुंच स्थापित होनी चाहिए लेकिन छत्तीसगढ़ मे इसका अभाव है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है

अमोल मालूसरे
समाज सेवक व राजनैतिक विश्लेषक